Wednesday, 5 August 2015

उनकहा प्यार

आज फिर वो हमे मिलने को आये

कैसी दुविधा हम पर लाये

उनको देख कर हम सकपकाये

वो हमे देख कर चक्कर्राये

उम्मीद ना थी कि हम टकरायेंगे

मगर इस घडी में हम युँ  घबराये

देख अपनी पुरानी यादो के साये

उन्हें न था किसी का खौफ

न थी कोई हड़बड़ाहट उनमें

हमने भी छोड दी घबराहट

बेशर्म हम भी बन गये

वो आज भी मौन हैं

वो तब भी मौन ही थे

इसी मौन में हम न कुछ कह पाए

आज भी हम केवल नज़र चुरा कर देख रहे थे

तब भी हम केवल नज़र चुरा कर देखते थे

एक बार लगा की शायद वो वापस आ गए

क्योंकि निगाहे आज भी टकराते ही झुक जाती

जैसी पहले झुक जाती निगाहे उनकी

कितने मुश्किलों से सम्भाल रहे हैं हम अपने आप को

लगा की आज दूरियां मिट जाएँगी

मगर आज भी वो अपनी बैटन में उलझा कर

मुस्कुराते हुए हमसे विदा ले रही थी

रोकने की कोशिश हम करना चाहते थे

मगर किस बात का डर हम को रोक रहा था

वो अनकहा अपना सा प्यार हमसे दूर जा रहा था

एक बार लगा जैसे अपनी जान हमारे शरीर से निकल

कर कही दूर जा रही हैं बिना हमसे कुछ कहे

अनकहा अपना सा



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