आज पुरानी यादोँ में खोने का मन करता हैं
कहीं दूर उसी वादियों में जाने को मन करता हैं
वो दिन थे क्या दिन थे रातें क्या रात थी
दिन चढ़ते ही मटर गस्ती के साथ खाना पीना
दौड़ धुप में कभी धुप लगी ना छावं
बड़ो का गुस्सा और साथियों से लड़ाई
कभी खेल तो कभी पढ़ाई
दोस्तों आवाज़ पर दीवारों को फांधना
ना किसी से डर न किसी से बैर
था बस एक अल्हड़पन सहारा
पतंग की तरह हर डोर से बंधते हुये भी
किसी के हाथ में न आना और दूर तक जाना
ना मंज़िल थी ना कोई ठिकाना
रात होते ही वही पंछियों की तरह घर में आना
सबके साथ बैठकर खा पी कर बैठ जाना
फिर वही आंघन में सबके साथ सो जाना
ना किसी का लेना ना ही किसी का देना
ना किसी का हिसाब और ना ही किसी का अहसान
थी तो बस एक सपनो से भरी गहरी नींद
आज भी उस प्यारी सी नींद को हम खोज रहे हे
वही पुरानी यादो में खुद को और अपनों को खोज रहे हैं !
कहीं दूर उसी वादियों में जाने को मन करता हैं
वो दिन थे क्या दिन थे रातें क्या रात थी
दिन चढ़ते ही मटर गस्ती के साथ खाना पीना
दौड़ धुप में कभी धुप लगी ना छावं
बड़ो का गुस्सा और साथियों से लड़ाई
कभी खेल तो कभी पढ़ाई
दोस्तों आवाज़ पर दीवारों को फांधना
ना किसी से डर न किसी से बैर
था बस एक अल्हड़पन सहारा
पतंग की तरह हर डोर से बंधते हुये भी
किसी के हाथ में न आना और दूर तक जाना
ना मंज़िल थी ना कोई ठिकाना
रात होते ही वही पंछियों की तरह घर में आना
सबके साथ बैठकर खा पी कर बैठ जाना
फिर वही आंघन में सबके साथ सो जाना
ना किसी का लेना ना ही किसी का देना
ना किसी का हिसाब और ना ही किसी का अहसान
थी तो बस एक सपनो से भरी गहरी नींद
आज भी उस प्यारी सी नींद को हम खोज रहे हे
वही पुरानी यादो में खुद को और अपनों को खोज रहे हैं !
No comments:
Post a Comment