Saturday, 19 March 2016

YADEIN PURANI

आज पुरानी यादोँ में खोने का मन करता हैं

कहीं दूर उसी वादियों में जाने को मन करता हैं

वो दिन थे क्या दिन थे रातें क्या रात थी

दिन चढ़ते ही मटर गस्ती के साथ खाना पीना

दौड़ धुप में कभी धुप लगी ना  छावं

 बड़ो का गुस्सा और साथियों से लड़ाई

कभी खेल तो कभी पढ़ाई

दोस्तों  आवाज़ पर दीवारों को फांधना

ना  किसी से डर न किसी से बैर

था बस एक अल्हड़पन  सहारा

पतंग की तरह हर डोर से बंधते हुये भी

किसी के हाथ में न आना और दूर तक जाना

ना मंज़िल थी ना कोई ठिकाना

रात होते ही वही पंछियों की तरह घर में आना

सबके साथ बैठकर खा पी कर बैठ जाना

फिर वही आंघन में सबके साथ सो जाना

ना  किसी का लेना ना ही किसी का  देना

ना  किसी का हिसाब और ना ही किसी का अहसान

थी तो बस एक सपनो से भरी गहरी नींद

आज भी उस प्यारी सी नींद को हम खोज रहे हे

वही पुरानी यादो में खुद को और अपनों को खोज रहे हैं !






No comments:

Post a Comment