Thursday, 26 May 2016

एक हसीन सपना

एक हसीन सपना 
रात को सोते वक्त नयी फिल्म देख रहा था
फिल्म की नायिका का नाच देख रहा था
उसी में खोये कब आँख लग गयी पता नहीं चला
सपने में उसको उठाये नदी पार कर रहा था
एक ठोकर लगी और धड़ाम से गिर पड़ा
लगा जैसे छाती पर पहाड़ गिर पड़ा
आँख खुली तो देखा श्रीमतीजी का हाथ था
जो अभी अभी मेरी छाती पर गलती से लगा था
आँखें बाहर आने को थी
मुंह से आवाज़ निकलने को थी
दोनों हाथों से अपनी आवाज़ को रोका
वरना श्रीमतीजी का जागना उससे भारी था
चुपके से उठकर बाथरूम में पंहुचा था
सारी दबी आवाज़ को बाहर निकलना था
आईने में अपनी डरी हुयी सूरत को देखना था
मगर वहा किसी भूतनी का साया नज़र आना था
पीछे मुड़कर देखा तो पत्नी का साया था
आवाज़ का गले में ही अटकना था
हालत में किसी गधे से काम नहीं था
न धोबी का न घाट का था
५४ इंचे की उनकी आँखों को देखना था
वीर सैनिक की तरह मुझे खड़ा होना था 
अपनी मौत का तांडव दिखना था
तभी घडी के बारह बजना था
उसका मुझे समझाना था
खतरे से कैसे निपटना था
दबे पाव पलंग पर सोना था
पास में किसी दुश्मन को सुलाना था
बंद कर आँखे हमे सोना का था
हिलना डुलना भी खतरा था
देर सुबह जब आँख खुलना था
श्रीमतीजी का भाषण सुनना था
किस्सा  डरावनी फिल्म का था
वो मैं थी जो तुम्हे बचाना था 
वरना तुम्हारा तो राम नाम होना था
हम भी सोचने को हुए
जब चौबीसो घंटे डरावनी फिल्म
साथ रहती हो तो
कोनसा डर और कोनसा भूत
वो तो तुम्हारा जरा सा हाथ लगना था
पुरे में तो हमारा राम नाम होना था


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