समय का उदय ३
जय सुबह जल्दी उठा कर बिना नास्ता किये सीधे अपने दोस्त अनिल के घर पंहुचा। जय ने बताया कि अनिल
तुम्हारी पत्नी का मैंने सरकारी नौकरी की सिफारिश कर दी हैं और अगले हफ्ते लेटर आ जायेगा और जब लेटर आ जाये तब साहब को करीब ५० हजार देने होंगे क्योकि साहब ने कहा की पहले पत्र आये तब पैसे लेने हैं।
अनिल ने कहा . नहीं नहीं जय तुम साहब को आज ही पैसे दे दो।आज शाम को मेरे घर आ जाना मैं तुम्हे पुरे पैसे दे दुंगा। जय बोल। .कि साहब ने बाद में देने को बोल हैं। इसलिए तुम पत्र आने पर ही देना। मगर अनिल ने कहा की तब तक तुम अपने पास पैसे रख लो। मुझे तुम पर विश्वाश हैं। जय बोल ठीक हैं. शाम को ऑफिस से घर जाते वक्त ले जाऊंगा। जय शाम को अनिल के घर पहुंच गया। अनिल ख़ुशी के मारे पैसे और मिठाई दोनों रख कर जय का ही इंतजार कर रहा था। थोड़ी मिठाई खाने के बाद बहार निकलते वक्त अनिल ने जय को पैसे भी दिए और बहुत बहुत धन्यवाद भी दिया। रास्ते में जय उदय को मन ही मन थेंक्स देते हुए घर की तरफ निकल पड़ा। क्योकि उदय ने ही ये भविष्यवाणी की थी की अनिल की पत्नी का सरकारी अध्यापिका में चयन हो गया हेैं। जय सोचने लगा ही अब उदय को किसी भी तरह दुखी नहीं रखूँगा ,उसकी हर मांग पूरी करूँगा क्योकि दो बार वो दुखी या नाराज़ हुआ तब उसने ऐसी ही दुखभरी भविष्यवाणी की थी। धीरे धीरे जय उदय को स्कूल कम भेज कर भविष्यवाणी ही सुनता और अपने साहब , अध्यापिका और रिस्तेदारो को अपनी ऊपर तक जान पहचान बता कर काम करवाने के मनचाहा पैसे वसूलने लगा। अमरलाल जी ने ये सब पता कर लिया की उनका बेटा आजकल पैसे कैसे कमा रहा हेैं। उन्होंने जय को बुलाकर कहा की ये सब गलत हैं। भलाई की जगह तुम्हे पैसों का लालच आ गया। थोड़ा सा रहम कर। जय ने अपने पिताजी को चुप रहने का कह कर चला गया। अमरलाल जी अपने पुत्र के आगे चुप हो गए। मगर उन्हें ये सब सही नहीं लग रहा था क्योकि उदय अब कुछ ज्यादा ही भविष्यवाणी करने लगा था। पढ़ाई लगभग बंद कर राखी थी। प्राध्यापकजी को भी जय ने कुछ काम करवाने का पैसा ले रख था इसलिए उदय को केवल परीक्षा देने ही जाना पड़ता था। जय ने नया मकान ,
गाडी ले ली। इसका कारण उदय ही हेैं । मगर उसको किस प्रकार उदय की मुंह से निकलवानी हे ये केवल जय को ही आता। एक दिन कुछ लोग जय के घर के बहार आकर जमा हो गए। थोड़ी देर बाद एक नेता भी आया।
शमशेर सिंह चौहान जो की एक गुंडा होने के साथ एक नेता भी था मगर उसको अपनी पार्टी से थोड़ी अनबन चल रही थी। उसने जय को कहा की अगर वो इस बार चुनाव में प्रत्याशी बनवा दे तो जय को प्रमोशन के साथ कभी काफी धन भी दिलवा देगा। जय ने जोश में हा भर दी। क्योकि उसने उदय के मुंह से कब निकलवाना हे ये तरीका पता था। जय ने शमशेर सिंह से पूछा की उन्होंने किस किस से अपने टिकट सिफारिश की हैं।
जय सुबह जल्दी उठा कर बिना नास्ता किये सीधे अपने दोस्त अनिल के घर पंहुचा। जय ने बताया कि अनिल
तुम्हारी पत्नी का मैंने सरकारी नौकरी की सिफारिश कर दी हैं और अगले हफ्ते लेटर आ जायेगा और जब लेटर आ जाये तब साहब को करीब ५० हजार देने होंगे क्योकि साहब ने कहा की पहले पत्र आये तब पैसे लेने हैं।
अनिल ने कहा . नहीं नहीं जय तुम साहब को आज ही पैसे दे दो।आज शाम को मेरे घर आ जाना मैं तुम्हे पुरे पैसे दे दुंगा। जय बोल। .कि साहब ने बाद में देने को बोल हैं। इसलिए तुम पत्र आने पर ही देना। मगर अनिल ने कहा की तब तक तुम अपने पास पैसे रख लो। मुझे तुम पर विश्वाश हैं। जय बोल ठीक हैं. शाम को ऑफिस से घर जाते वक्त ले जाऊंगा। जय शाम को अनिल के घर पहुंच गया। अनिल ख़ुशी के मारे पैसे और मिठाई दोनों रख कर जय का ही इंतजार कर रहा था। थोड़ी मिठाई खाने के बाद बहार निकलते वक्त अनिल ने जय को पैसे भी दिए और बहुत बहुत धन्यवाद भी दिया। रास्ते में जय उदय को मन ही मन थेंक्स देते हुए घर की तरफ निकल पड़ा। क्योकि उदय ने ही ये भविष्यवाणी की थी की अनिल की पत्नी का सरकारी अध्यापिका में चयन हो गया हेैं। जय सोचने लगा ही अब उदय को किसी भी तरह दुखी नहीं रखूँगा ,उसकी हर मांग पूरी करूँगा क्योकि दो बार वो दुखी या नाराज़ हुआ तब उसने ऐसी ही दुखभरी भविष्यवाणी की थी। धीरे धीरे जय उदय को स्कूल कम भेज कर भविष्यवाणी ही सुनता और अपने साहब , अध्यापिका और रिस्तेदारो को अपनी ऊपर तक जान पहचान बता कर काम करवाने के मनचाहा पैसे वसूलने लगा। अमरलाल जी ने ये सब पता कर लिया की उनका बेटा आजकल पैसे कैसे कमा रहा हेैं। उन्होंने जय को बुलाकर कहा की ये सब गलत हैं। भलाई की जगह तुम्हे पैसों का लालच आ गया। थोड़ा सा रहम कर। जय ने अपने पिताजी को चुप रहने का कह कर चला गया। अमरलाल जी अपने पुत्र के आगे चुप हो गए। मगर उन्हें ये सब सही नहीं लग रहा था क्योकि उदय अब कुछ ज्यादा ही भविष्यवाणी करने लगा था। पढ़ाई लगभग बंद कर राखी थी। प्राध्यापकजी को भी जय ने कुछ काम करवाने का पैसा ले रख था इसलिए उदय को केवल परीक्षा देने ही जाना पड़ता था। जय ने नया मकान ,
गाडी ले ली। इसका कारण उदय ही हेैं । मगर उसको किस प्रकार उदय की मुंह से निकलवानी हे ये केवल जय को ही आता। एक दिन कुछ लोग जय के घर के बहार आकर जमा हो गए। थोड़ी देर बाद एक नेता भी आया।
शमशेर सिंह चौहान जो की एक गुंडा होने के साथ एक नेता भी था मगर उसको अपनी पार्टी से थोड़ी अनबन चल रही थी। उसने जय को कहा की अगर वो इस बार चुनाव में प्रत्याशी बनवा दे तो जय को प्रमोशन के साथ कभी काफी धन भी दिलवा देगा। जय ने जोश में हा भर दी। क्योकि उसने उदय के मुंह से कब निकलवाना हे ये तरीका पता था। जय ने शमशेर सिंह से पूछा की उन्होंने किस किस से अपने टिकट सिफारिश की हैं।
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