समय का उदय,,,,,,,,,, ४
शमशेर सिंह ने बताया कि अपने शहर में और अपनी पार्टी के सभी उच्च नेताओं से बात कर ली हैं मगर अभी
तक किसी ने भी सही जवाब नहीं दिया हैं। आप पता करवाए कि मुझे टिकट मिलेगा या नहीं और अगर मिलता हैं तो मुझे किसको कितना देना होगा। जय ने दो चार दिन में बताने को कह कर उन्हें वापस भेज दिया। जय को ये काम बहुत ही आसान लग रहा था मगर साथ में एक डर भी था कि अगर थोड़ी सी भी चूक हुयी तो ये शमशेर उसे मर डालेगा। हल्का हल्का सर्दी मौसम होने के कारण जय ने सोचा की कुछ दिन कही घूमने
का मूड बनाया जाये जिससे उदय भी खुश रहेगा और शमशेर की परेशानी दूर हो जाएगी। घर के सभी सदस्य
को तैयार करके घर से निकल पड़े पहाड़ियों की ओर। पैसों की कमी नहीं होने के कारण एक बढ़िया सी होटल में
जाकर रुके। सफर की थकान के कारण सभी आराम करने लगे मगर उदय को बाहर का नज़ारा सुन्दर दिखने के कारण मन ख़ुशी से झूम रहा था। उदय की मम्मी ने सबको आराम का कहा और खुद ही उसका ध्यान रखने का मन कर लिया। कमरे की खिड़की से उच्चे उच्चे पहाड़ों को देखने लगा। इतनी देर गाडी चलाने के कारण जय को नींद आ गयी। काफी देर तक सोने के बाद जब जय की आँख खुली तब उसने अपनी पत्नी को पूछा की उदय ने कुछ अजीबो गरीब बात तो नहीं बोली। पत्नी ने कहा की नहीं और वैसे मेने ध्यान नहीं दिया की ये क्या बड़बड़ा रहा हेैं। क्यों कुछ ख़ास बात। जय ने हँसते हुए कहा नहीं ऐसे ही। उदय सो रहा था। सभी तैयार हो गए घूमने लिए। उदय को भी जगा कर साथ में ले लिया। उदय अपने पापा का हाथ पकड़े हुए पहाड़ी चढ़ रहा था की बोला .पापा पापा आपको सारे लोग मालाएं क्यों पहना रहे हैं और आप सबको हाथ जोड़कर हँसते हुए जा रहे हैं। ऐसा क्युँ पापा। अब जय को लगा की शमशेर की जगह उसे टिकट मिल रहा हैं इसका मतलब अगर
मैं प्रयास करू तो ये ही होगा। उदय ने बोलना जारी रखा मगर जय ख़ुशी के मारे ध्यान नहीं दिया। रात्रि में जब सभी होटल में भोजन कर रहे थे तब जय ने ऑफिस का जरुरी काम होने के कारण वापस घर चलने को बोला की सुबह जल्दी चलेंगे। रात को सोते हुए सोचने लगा कि इन दिनों में वो थोड़ी बहुत नेतागिरी तो करने लगा मगर खुद नेता बनूँगा ये नहीं सोचा मगर अब कल अपने शहर पहुंचते ही पार्टी ऑफिस जाकर अपनी बात करता हु मगर ये शमशेर जो की एक माना हुआ गुंडा है इसको कैसे सम्भालू। ये सोचते हुए नींद कब आ गयी पता ही नहीं चला। रात को करीब ३-४ बजे अचानक नींद खुली। क्योकि उदय ने सुबह पहाड़ी पर चढ़ते हुए जो बोला उस ओर ध्यान क्यों नहीं गया। अब जय डरने लगा। उसे नींद नहीं आ रही थी। करवटे बदलते हुए सुबह ६ बजे उठकर तैयार होने लगा। फिर सोचने लगा की कुछ अच्छा ही बोला होगा। अपने शहर पहुंच कर जब वो पार्टी कार्यालय पंहुचा तो शमशेर भी वही था। अंदर किसी को नहीं जनता था मगर शमशेर ने सबसे मिलवाया की ये वो हस्ती हैं जो हाई कमान तक अपनी पहुंच रखती है और मेरे बहुत ही अच्छे दोस्त भी है। इतना कहते ही जय का सीना चौड़ा हो गया। सोचने लगा की मैं ऐसे ही डर रहा था शमशेर से। बड़े बड़े नेताओं ने जय खातिर दारी की और शमशेर को समझाया की यदि तुझे टिकट दे तो बहुत से पढ़े लिखे लोग अपनी पार्टी को वोट नहीं देंगे और अगर तुम्हारे दोस्त को टिकट दे तो तुम्हारा साथ होने के कारण एवं इनकी ऊपर तक पहुंच होने के कारण हमारी जीत पक्की होगी। शमशेर को थोड़ा गुस्सा आया मगर पार्टी में जय को उसी ने लाया और जय की खूब तारीफ की इसलिए वो अनमन से हा कहते हुए चुपचाप बैठा रहा। सबके हा करने पर , आला कमान का आदमी होने के कारण जय को टिकट मिल गयी। शमशेर अब उसका ख़ास दोस्त बन गया मगर अंदर ही अंदर वो नफरत करने लगा। मगर वो कुछ कर नहीं सकता था। चुनाव भी जीत लिया जय ने। शमशेर ने बहुत बड़ी पार्टी दी। जय को अपने पापा से बात करने का समय नहीं मिल रहा था की वो कह सके की देखो मेने उस शक्ति से क्या पाया हैं। इधर अमरलाल जी काफी विचलित थे क्योकि उन्होंने उदय की थोड़ी बहुत बातें सुनी जो वो पहाड़ पर चढ़ते वक्त अपने पापा को कहा। शमशेर गलत काम ज्यादा करता था इसलिए उसका पुलिस थानों में कई मामले दर्ज़ थे वो अपने दोस्त जय से कह कर सरे मामले रफादफा करवाना चाहता था मगर बहुत ही संगीन मामले होने और न्यायालय में सारे मामला चलने के कारण इतना आसान नहीं था मगर शमशेर कुछ भी सुनने तैयार नहीं था। धीरे धीरे दोनों में अनबन होने लगी। जय अब भी उदय की भविष्यवाणी के साथ था मगर थोड़ा नेतापन आने के कारण अपने में घमंड आने लगा। अमरलाल जी काफी डरे से रहने लगे क्योकि उस दिन उदय ने कहा वो पूरा नहीं सुन पाए बस इतना ही सुनाई दिया की हमारे घर में सभी सफ़ेद कपडे पहने हुए क्यों थे और दिन में मम्मी और एक जिसका नाम सुनाई नहीं दिया वो सो क्यों रहे थे। जय से जब भी अमरलाल जी बात करने कि कोशिश करते जय बोलता की देख लो हम सभी कहाँ से कहाँ पहुंच गए। हमेशा आप डरते रहते हेैं।
इधर शमशेर को किसी तरह वो क्लास की अध्यापिका मिल गयी जो स्कूल में उदय के बोलने पर दूसरे दिन घटित हुआ। अब शमशेर ने बाप बेटे को ख़त्म करने की योजना बनानी शुरू कर दी। एक दिन जब उदय और उसकी मम्मी स्कूल से लौट रहे थे तब उसने ड्राइवर के सामने बोला की पापा और दादाजी अकेले पुराने घर में बैठे हुए रो रहे हैं। इतना कहना था की पीछे से ट्रक ने जोरदार टक्कर मारी। उदय और उसकी मम्मी पीछे वाली सीट पर बैठे होने के कारण दोनों को गहरी चोटे आई। हॉस्पिटल में डॉक्टर्स के लाख कोशिश करने के बाद भी दोनों को बचाया नहीं जा सका। इस हादसे से जय एकदम टूट गया। अमरलाल जी को भी उदय की भविष्यवाणी अब समझ आई। जय कीसारी हकीकत शमशेर ने जग जाहिर कर दी की उसकी कही किसी से पहचान नहीं हैं और लोगो को वो ठग रहा हैं। उससे सभी नफरत करने लगे। ऑफिस में भी उसकी कोई इज्जत नहीं रही। उसके भाग्य का उदय समाप्त हो गया। धीरे धीरे पैसे भी ख़त्म होने के कारण वही पुराने घर में आ गए। ड्राइवर जब उनसे विदा लेने आया तो वही पुराने मकान में दोनों बाप बेटे बैठे रो रहे थे। जय अपने लालच को कोस रहा था। ड्राइवर बोला .साहब। .उस दिन उदय साहब का यही अंतिम वाक्य था कि दादाजी और पापा पुराने घर में बैठे रो क्यों रहे हे इतने में टक्कर हो और सब ख़त्म हो गया. . जय के समय का उदय और उदय का समय दोनों समाप्त हो गए।
शमशेर सिंह ने बताया कि अपने शहर में और अपनी पार्टी के सभी उच्च नेताओं से बात कर ली हैं मगर अभी
तक किसी ने भी सही जवाब नहीं दिया हैं। आप पता करवाए कि मुझे टिकट मिलेगा या नहीं और अगर मिलता हैं तो मुझे किसको कितना देना होगा। जय ने दो चार दिन में बताने को कह कर उन्हें वापस भेज दिया। जय को ये काम बहुत ही आसान लग रहा था मगर साथ में एक डर भी था कि अगर थोड़ी सी भी चूक हुयी तो ये शमशेर उसे मर डालेगा। हल्का हल्का सर्दी मौसम होने के कारण जय ने सोचा की कुछ दिन कही घूमने
का मूड बनाया जाये जिससे उदय भी खुश रहेगा और शमशेर की परेशानी दूर हो जाएगी। घर के सभी सदस्य
को तैयार करके घर से निकल पड़े पहाड़ियों की ओर। पैसों की कमी नहीं होने के कारण एक बढ़िया सी होटल में
जाकर रुके। सफर की थकान के कारण सभी आराम करने लगे मगर उदय को बाहर का नज़ारा सुन्दर दिखने के कारण मन ख़ुशी से झूम रहा था। उदय की मम्मी ने सबको आराम का कहा और खुद ही उसका ध्यान रखने का मन कर लिया। कमरे की खिड़की से उच्चे उच्चे पहाड़ों को देखने लगा। इतनी देर गाडी चलाने के कारण जय को नींद आ गयी। काफी देर तक सोने के बाद जब जय की आँख खुली तब उसने अपनी पत्नी को पूछा की उदय ने कुछ अजीबो गरीब बात तो नहीं बोली। पत्नी ने कहा की नहीं और वैसे मेने ध्यान नहीं दिया की ये क्या बड़बड़ा रहा हेैं। क्यों कुछ ख़ास बात। जय ने हँसते हुए कहा नहीं ऐसे ही। उदय सो रहा था। सभी तैयार हो गए घूमने लिए। उदय को भी जगा कर साथ में ले लिया। उदय अपने पापा का हाथ पकड़े हुए पहाड़ी चढ़ रहा था की बोला .पापा पापा आपको सारे लोग मालाएं क्यों पहना रहे हैं और आप सबको हाथ जोड़कर हँसते हुए जा रहे हैं। ऐसा क्युँ पापा। अब जय को लगा की शमशेर की जगह उसे टिकट मिल रहा हैं इसका मतलब अगर
मैं प्रयास करू तो ये ही होगा। उदय ने बोलना जारी रखा मगर जय ख़ुशी के मारे ध्यान नहीं दिया। रात्रि में जब सभी होटल में भोजन कर रहे थे तब जय ने ऑफिस का जरुरी काम होने के कारण वापस घर चलने को बोला की सुबह जल्दी चलेंगे। रात को सोते हुए सोचने लगा कि इन दिनों में वो थोड़ी बहुत नेतागिरी तो करने लगा मगर खुद नेता बनूँगा ये नहीं सोचा मगर अब कल अपने शहर पहुंचते ही पार्टी ऑफिस जाकर अपनी बात करता हु मगर ये शमशेर जो की एक माना हुआ गुंडा है इसको कैसे सम्भालू। ये सोचते हुए नींद कब आ गयी पता ही नहीं चला। रात को करीब ३-४ बजे अचानक नींद खुली। क्योकि उदय ने सुबह पहाड़ी पर चढ़ते हुए जो बोला उस ओर ध्यान क्यों नहीं गया। अब जय डरने लगा। उसे नींद नहीं आ रही थी। करवटे बदलते हुए सुबह ६ बजे उठकर तैयार होने लगा। फिर सोचने लगा की कुछ अच्छा ही बोला होगा। अपने शहर पहुंच कर जब वो पार्टी कार्यालय पंहुचा तो शमशेर भी वही था। अंदर किसी को नहीं जनता था मगर शमशेर ने सबसे मिलवाया की ये वो हस्ती हैं जो हाई कमान तक अपनी पहुंच रखती है और मेरे बहुत ही अच्छे दोस्त भी है। इतना कहते ही जय का सीना चौड़ा हो गया। सोचने लगा की मैं ऐसे ही डर रहा था शमशेर से। बड़े बड़े नेताओं ने जय खातिर दारी की और शमशेर को समझाया की यदि तुझे टिकट दे तो बहुत से पढ़े लिखे लोग अपनी पार्टी को वोट नहीं देंगे और अगर तुम्हारे दोस्त को टिकट दे तो तुम्हारा साथ होने के कारण एवं इनकी ऊपर तक पहुंच होने के कारण हमारी जीत पक्की होगी। शमशेर को थोड़ा गुस्सा आया मगर पार्टी में जय को उसी ने लाया और जय की खूब तारीफ की इसलिए वो अनमन से हा कहते हुए चुपचाप बैठा रहा। सबके हा करने पर , आला कमान का आदमी होने के कारण जय को टिकट मिल गयी। शमशेर अब उसका ख़ास दोस्त बन गया मगर अंदर ही अंदर वो नफरत करने लगा। मगर वो कुछ कर नहीं सकता था। चुनाव भी जीत लिया जय ने। शमशेर ने बहुत बड़ी पार्टी दी। जय को अपने पापा से बात करने का समय नहीं मिल रहा था की वो कह सके की देखो मेने उस शक्ति से क्या पाया हैं। इधर अमरलाल जी काफी विचलित थे क्योकि उन्होंने उदय की थोड़ी बहुत बातें सुनी जो वो पहाड़ पर चढ़ते वक्त अपने पापा को कहा। शमशेर गलत काम ज्यादा करता था इसलिए उसका पुलिस थानों में कई मामले दर्ज़ थे वो अपने दोस्त जय से कह कर सरे मामले रफादफा करवाना चाहता था मगर बहुत ही संगीन मामले होने और न्यायालय में सारे मामला चलने के कारण इतना आसान नहीं था मगर शमशेर कुछ भी सुनने तैयार नहीं था। धीरे धीरे दोनों में अनबन होने लगी। जय अब भी उदय की भविष्यवाणी के साथ था मगर थोड़ा नेतापन आने के कारण अपने में घमंड आने लगा। अमरलाल जी काफी डरे से रहने लगे क्योकि उस दिन उदय ने कहा वो पूरा नहीं सुन पाए बस इतना ही सुनाई दिया की हमारे घर में सभी सफ़ेद कपडे पहने हुए क्यों थे और दिन में मम्मी और एक जिसका नाम सुनाई नहीं दिया वो सो क्यों रहे थे। जय से जब भी अमरलाल जी बात करने कि कोशिश करते जय बोलता की देख लो हम सभी कहाँ से कहाँ पहुंच गए। हमेशा आप डरते रहते हेैं।
इधर शमशेर को किसी तरह वो क्लास की अध्यापिका मिल गयी जो स्कूल में उदय के बोलने पर दूसरे दिन घटित हुआ। अब शमशेर ने बाप बेटे को ख़त्म करने की योजना बनानी शुरू कर दी। एक दिन जब उदय और उसकी मम्मी स्कूल से लौट रहे थे तब उसने ड्राइवर के सामने बोला की पापा और दादाजी अकेले पुराने घर में बैठे हुए रो रहे हैं। इतना कहना था की पीछे से ट्रक ने जोरदार टक्कर मारी। उदय और उसकी मम्मी पीछे वाली सीट पर बैठे होने के कारण दोनों को गहरी चोटे आई। हॉस्पिटल में डॉक्टर्स के लाख कोशिश करने के बाद भी दोनों को बचाया नहीं जा सका। इस हादसे से जय एकदम टूट गया। अमरलाल जी को भी उदय की भविष्यवाणी अब समझ आई। जय कीसारी हकीकत शमशेर ने जग जाहिर कर दी की उसकी कही किसी से पहचान नहीं हैं और लोगो को वो ठग रहा हैं। उससे सभी नफरत करने लगे। ऑफिस में भी उसकी कोई इज्जत नहीं रही। उसके भाग्य का उदय समाप्त हो गया। धीरे धीरे पैसे भी ख़त्म होने के कारण वही पुराने घर में आ गए। ड्राइवर जब उनसे विदा लेने आया तो वही पुराने मकान में दोनों बाप बेटे बैठे रो रहे थे। जय अपने लालच को कोस रहा था। ड्राइवर बोला .साहब। .उस दिन उदय साहब का यही अंतिम वाक्य था कि दादाजी और पापा पुराने घर में बैठे रो क्यों रहे हे इतने में टक्कर हो और सब ख़त्म हो गया. . जय के समय का उदय और उदय का समय दोनों समाप्त हो गए।
No comments:
Post a Comment