Wednesday, 11 May 2016

अभिनेता की डायरी

अभिनेता की डायरी
मेरा नाम प्रकाश चन्द हैं लोग मुझे पी सी के नाम से ज्यादा जानते हैं। मेरी उम्र जब १२ साल की तब पिताजी सूरज प्रकाशजी एक भयंकर बीमारी के कारण चल बसे। हम लोग साधारण परिवार और नौकरी वाले परिवार से थे इसलिए पिताजी के जाने के बाद माताजी जो की कुछ खास पढ़ी लिखी नहीं थी मगर दुनिया दारी अच्छे से जानती थी इसलिए गॉव के स्कूल में एक अध्यापिका के रूप में पढ़ाने लगी। मैं और मेरी छोटी बहन उसी स्कूल में बिना किसी शुल्क के पढ़ते थे। पैसे  लगते मगर माताजी की तन्खाह में से काट लिए जाते। तेसे तेसे गॉव की पढ़ाई पूरी करके शहर आया। गरीब होने का अहसास मुझे पहले से था इसलिए माताजी से कम पैसे लेता था। क्योकि छोटी बहन की शादी जो करनी थी। शहर आते ही थोड़ी बहुत हवा लग गयी। कद काठी में अच्छा होने के कारण अपने आपको हीरो समझता था। कॉलेज में छोटे मोठे रोल किये तो एक दिन स्टेज शो वालों ने अभिनय के लिए बुलवाया। गॉव छोड़े अभी कुछ महीने ही हुए हैं। सोचा कुछ अभिनय से पैसे मिल जायेंगे तो अपना खर्चे के साथ बहन के लिए भी बचा लेंगे। बस इसी कारण से अभिनय में कूद गए। पहला रोल एक नौकर का मिला। धीरे धीरे उस नाटक कंपनी में मैं नौकर ही बन गया और नौकर का रोल अदा करने लगा। पैसे की कमी के कारण वहा के थोड़े बहुत काम कर लेता था। अभिनय भी अच्छा करने लगा मगर नौकर केवल नौकर ही बन सकता था। हीरो तो हमारे नाटक कंपनी के साले साहब महकजी थे। उनके नखरे भी खतरनाक थे। हर बात में अपनी हैशियत को जताना और घमंड के कारण गुस्सा सातवें आसमान पर। मुझे वहा काम करते अब करीब ६ महीने हो गए। मैंने १५ से ज्यादा बार नौकर का ,४-५ बार भाई का और एक दो बार मंत्री का रोल किया। सभी में मेरी तारीफ हुयी। ये बात महकजी को पसंद क़म आई थी मगर अपनी दिखाने के चक्कर में मुझे कहते की थोड़ा मुझसे अभिनय सीख ले तो तुझे नौकर से अच्छा रोल दिलवा दूंगा। मैं कुछ नहीं बोलता मगर अच्छे से जानता था की सेठजी अपनी बीबी के कारण ऐसे हीरो बना रखा हैं। पूरी नाटक मंडली मुझे हीरो की तरह पसंद करते मगर अपने पेट की भूख के कारण कोई नहीं बोलता था। माताजी ने बहन की शादी तय होने का सन्देश भिजवा दिया। ख़ुशी से झूम उठा मगर अगले ही पल ज़मीन पर आ गया। अच्छे घराने में शादी तय हुयी हैं तो शादी उसी के हिसाब से होगी। खर्चा अधिक होगा। माताजी भी कहा से इतने पैसे लाएगी। मन बहुत उदास रहने लगा।
हमारी नाटक कंम्पनी में एक लड़की हल्की  फिल्मों में छोटे छोटे काम करती थी और इतराती की उसको बहुत अच्छे पैसे मिले हैं। काफी सोच समझ कर मैंने उसे कोई फिल्म में रोल दिलाने को बोला। दो चार रोज़ नखरे करती रही फिर अचानक एक दिन मुझे काम दिलाने के बदले कुछ पैसे मांगे ,मेने बताया की पैसे के लिए काम कर रहा हु ना की शौक के कारण। उसने कहा की अगर तुम मुझे आधी कीमत देते हो तो मैं तुझे एक फिल्म में अच्छा काम और पैसा दोनों दिलवा दूंगी। मेने कुल कितनी धनराशि मिलेगी तो बोली की आधी रकम से बहन की शादी करने में आराम से काम आएगी। मैने तुरंत हां करदी। जब मुझे निर्देशक के पास लेकर गयी तो उसने भी अपना हिस्सा माँगा। मरता ना क्या करता वहा भी हा करदी। बहन की शादी का सवाल था। किसी तरह अभिनय का काम मिला ,अभिनय क्या था लगा बंधुआ मज़दूर बना दिया। वहा सभी अपनी अपनी मालिकाना हक़ जताते हुए अभिनय कम और दूसरे काम अधिक करवाते थे। फिल्म भी पूरी हो गए कुछ का पैसा मिला और बाकी का पैसा थोड़े दिन बाद देने का वादा हुआ। जो मिला उसमे से सभी अपना अपना हिस्सा ले गए। मामूली सी रकम ले कर जब गॉव पंहुचा तो माताजी ने ये रकम ऊठ के मुंह में जीरा बताया। पुराने दोस्तों से उधार लेकर बहन की शादी करवाई। सोचा शहर जाकर जब वो पैसे मिलेंगे तो सबसे पहले दोस्तों का उधार चुकता करूँगा। यही सोच कर गॉव से जल्दी भाग आया। शहर आकर निर्देशक और निर्माता के घर के चक्कर लगने लगे ,अभिनय के लिए नहीं पैसों के लिए। लोग अभिनय मांगने जाते और मैं पैसों के लिए। एक दिन निर्देशक महोदय ने एक और फिल्म करने को बोला और कहा की तुम्हे दोनों के पैसे साथ साथ मिलते रहेंगे। मैं तो केवल पिछला हिसाब चुकता करने को कहा मगर उन्होंने सिर्फ एक और फिल्म में काम करने को बोला। पैसे के लिए मेने हा कर दी क्योकि दोस्तों के उधार चुकाना था। मुझे वहा के हालात समझने में समय नहीं लगा। पिछली बार जितना परेशान करना था कर दिया इसलिए इसबार मैं भी थोड़ा अनुभव का ज्ञान देते हुए वहा अपने आपको स्तापित करने में लग गया। इस फिल्म में मैंने उच्च किस्म का अभिनय किया। सभी ने तारीफ की खास कर निर्देशक महोदय ने। फिल्म को जब परदे पर उतारा गया तो उसमे से काफी अंश हम लोगो के काट दिए गए। निर्देशक ने हीरो पर और हीरो ने फिल्म संसथान पर डाल दिया। दोस्तों का उधार चुकता कर माताजी ने मेरी शादी की बात की। गॉव में बहन की सहेली रानी माताजी को बहुत पसंद थी मुझे भी अच्छी लगती थी मगर अब गॉव से शहर आ गया तो माताजी को थोड़ा सोचने का समय माँगा। रानी भी हमे पसंद करती थी ये बात माताजी को पता था इसलिए माताजी ने मेरा इंतज़ार किये बगैर रानी को अपनी बहु स्वीकार कर ली। मुझे कोई और पसंद नहीं थी मगर फ़िल्मी दुनिया में पैर रख लिया तो अब कुछ बनने का ख्वाब देखने लगा। रोजना कॉलेज के बाद सभी निर्देशकों के घर ऑफिस के चक्कर लगने लगा। छोटे मोठे काम करके अपना गुजरा करने लगा। एक दिन एक बहुत ही बड़े निर्देशक जो अपने ज़माने में बहुत नाम था और अब उनकी माली हालात सही नहीं हैं ने मुझे कम बजट की फिल्म में हीरो के लिए बुलाया। मेने उनसे पूछा की मुझे ही क्यों तो बोले की एक फिल्म में तुम्हारे अभिनय को देखा जो काफी प्रभावित किया। मगर उनके पास बड़े हीरो लेने की हैशियत नहीं हैं इसलिए दोनों कारणों से मुझे बतौर अभिनेता बना रहे थे। मेने पैसो के बारे में पूछा तो बोले अगर फिल्म से अच्छी कमाई हुयी तो कुछ भागीदारी तुम्हारी रहेगी। मेने उस महान व्यक्ति के साथ काम करने को तैयार हो गया। उन्होंने कम बजट की बतई इसलिए सभी कलाकारों को निर्देश दिया की कड़ी मेह्नत करे जिससे बार बार फिल्मांकन का खर्चा ना करना पड़े। सभी कलाकार मिलझुल कर मेहनत से काम कर रहे थे। जब फिल्म लगभग पूरी होने को थी तब निर्देशक ने बताया की पैसों की कमी के कारण फिल्म रोकनी पड़ेगी। सभी कलाकार उदास हो गए। हमारे बीच एक ऐसा कलाकार था जो कभी भी अपना काम समय पर नहीं करता था और हरसमय हसी ठिठोली करता रहता था। उसने आज सबको इक्कठा करके कहा की इस समस्या की घडी में अगर हम साहब का हाथ मिलकर चले तो ये फिल्म जरूर पूरी होगी। सभी मिल कर निर्देशक साहब के ऑफिस में पहुंचे और बिना मेहनताना और किसी भी प्रकार का खर्चा न लेते हुए हमने काम करना बताया। निर्देशक साहब बोले  ..  आपलोग ने मुझे ये सहारा दिया हैं बहुत ही अच्छा लगा मगर फिल्म को थिएटर में उतारने के लिए पैसे नहीं हैं वो भी समस्या हैं। हमने वो भी किसी  से करने का दिलासा दिया। हमे सिर्फ फिल्म पूरी करने का जूनून था सभी को। आगे क्या परेशानियां आती हैं हम लोगो को नहीं मालूम। फिर भी हम सभी निर्देशक साहब के साथ हो गए। जैसे तेसे फिल्म पूरी हो गयी। अब फिल्म को किस बलबूते  परदे  लायी जाए। दिन निकलते जा रहे थे और हम सभी की हालत ख़राब हो थी खास कर मेरी। खाने के पैसे नहीं ऊपर से कॉलेज की फीस  और कमरे का किराया। समय  कॉलेज वालों ने परीक्षा  बैठने नहीं दिया। कमरे को छोड़ना पड़ा और एक होटल में  काम के एवज में रहना और खाना मिलने के कारण वही काम में लग गया। लम्बी दाढ़ी और फटे कपडे के कारण कोई पहचान नहीं पा रहा था। माताजी को अपनी हालत बता नहीं सकता इसलिए उनसे दुरी बना रखी थी। कुछ महीनो बाद एक थिएटर में एक फिल्म लगी जो धीरे धीरे इतनी महशूर हुयी की दो दिन पहले टिकट बुक करवाने पड़ते थे। मुझे भी वो फिल्म देखनी थी , होटल से भागकर वो फिल्म देखने पंहुचा तो दंग रहा। ये तो मेरी फिल्म हैं मगर नाम कुछ और। मैने सीधे निर्देशक के ऑफिस पहुंचकर उनसे सारा माज़रा पूछा। उन्होंने मुझे पहचाने से इंकार कर दिया। पहचानते भी कैसे। दूसरे दिन दाढ़ी बनाकर और मस्त कपडे पहनकर जब होटल से निकला तो टैक्सी वाले ने तुरंत पहचान कर मुझे हाथ मिलाया और बोला की आप तो आज की तारीख में सबसे बड़े अभिनेता हैं। आज आप हमारे टैक्सी में। मेने उससे कहा की में उस अभिनेता की तरह दीखता हु न की सच में हु। उसने निर्देशक साहब के घर के बाहर जब टैक्सी रोकी तो वहा पहले से बहुत भीड़ थी ,आज निर्देशक साहब अपनी फिल्म की कामयाबी के कारण वापस फ़िल्मी दुनिया में छा गए। मैं भीड़ में अपने आपको बचाता हुआ उनके पास पंहुचा। उन्होंने जोश खरोश से मेरा स्वागत किया और मुझे गले लगाया। मेरे अभिनय की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। मैं भी फुला नहीं समां रहा था। पूरी भीड़ हम दोनों हो देखने के लिए एकत्रित हो रही थी ,पुलिस वालो को स्थिति संभालने के लिए कठिनाई हो रही थी। निर्देशक साहब ने मुझे बताया की एक व्यापारी ने उस फिल्म को ख़रीदा हैं और अपना नाम दिया हैं। मुझे भी पैसों की कमी  तुम लोगो का दर्द सहन नहीं हो रहा था इसलिए इस फिल्म को बेच दी जो की आज जो भी मुनाफा हो रहा हैं वो सब उस व्यापारी का हैं। हम लोगो को थोड़ा बहुत पैसा मिला मगर निर्देशक साहब ने बताया की जो ख्याति मिली हैं वो पैसों का ढेर कर देगी इसलिए फ़िक्र नहीं करते हुए तुम मेरी अगली फिल्म में काम करोगे। मेने हा कर दी। मेहनताना सिर्फ इतना माँगा की मैं अपना व्यवसाय कर सकु और अपना घर चला सकु क्योकि फिल्मों की दुनिया में इतना उतार चढ़ाव देखकर मेने सिर्फ ये आखरी फिल्म करने को कहा। निर्देशक साहब ने कहा की पहले ये फिल्म तो करो और इस फिल्म में पैसों की कोई कमी नहीं होगी। पहली फिल्म में जब पुरस्कृत   को साथ लेकर गया। माताजी आज भी रानी का इंतज़ार करना बता  उससे शादी करवाना चाहती हैं। दूसरी फिल्म पूरी करते ही मैं शादी करलुंगा ये वादा माताजी को कर दिया। दूसरी फिल्म पूरी होने से पहले और कटनी फिल्में आ गयी। सबको मना करते करते मैं परेशान हो गया। आखिर में मेने एक दो और फिल्में करने का मानस बना लिया। एक दो एक दो करते करते आज पुरे २० फिल्में कर ली। शादी भी नहीं कर पाया। रानी आज भी गॉव में इंतज़ार कर रही हैं।  माताजी का स्वर्गवास हो गया। कुछ फिल्मों में काम कम चला। लगने लगा की अब काम ज्यादा नहीं हो सकता इसलिए जो फिल्में ले राखी हैं वो पूरी कर लेता हूँ। मगर हरबार कुछ अच्छा का लालच फिर फिल्म करने को मजबूर कर देता हैं। समय बीतता गया। मैं फ़िल्मी दुनिया में बस गया जहां से निकलना मुश्किल हो रहा था। एक दिन रानी शहर आकर मुझसे मिली। उसने बताया की वो अभी भी इंतज़ार कर रही हैं।
मेने उसे इस फिल्म लाइन को ना छोड़ने के कारण शादी नहीं कर पा रहा हु ,उसने कहा की अगर शादी करनी हैं तो आज अभी इसी समय मेरे साथ नयी ज़िन्दगी शुरू करो वरना मैं अपने लिए कोई और रास्ता ढूंढती हूँ। मैं कुछ नहीं बोल पा रहा था। काफी देर इंतज़ार के बाद रानी जैसे ही चलने लगी मेने कुछ समय और माँगा मगर उसने मना कर दिया। वो जाने लगी और में उसे रोक नहीं पा रहा था। वो चली गयी। मुझे अकेला छोड़ कर। सभी निर्माता निर्देशक को आगे काम न करने का कह कर मैं अपना काम समेट लिया। क्योकि काम में अब मन नहीं होने के कारण अच्छा अभिनय भी नहीं हो रहा था। अपना सारा काम समेटने में मुझे महीनो नहीं साल लग गए। शहर में जो कुछ था सब बेचकर सिर्फ एक अपनी कार ले कर गॉव की तरफ चल पड़ा। अपनी रानी के पास।  उम्र भी करीब ५० के आसपास हो गयी मगर रानी पर भरोसा था की वो मेरा इंतज़ार करेगी जरूर। जब गॉव पंहुचा तो सीधे  घर पंहुचा। उसके भाइयों ने बताया की वो  कुछ दिन पहले अपनी  मांग में नाम मेरे नाम का  सिंदूर भर कर इस दुनिया से चली गयी। बड़ी मुश्किल से अपने को सम्भालते हुए अपने मकान पंहुचा तो पता चला की माताजी ने वहा स्कूल बना कर मकान दान कर दिया। गॉव के सभी लोग मुझे अज़नबी की नज़र से देख रहे थे। कितने सालों बाद गॉव आया। यहाँ से वापस शहर को चनले का मन बना लिया और गाड़ी को शहर की तरफ भगा दी जहां भागदौड़ के अलावा कुछ नहीं हैं। आज अकेला हूँ फिल्मों में छोटे मोटे रोल साथ जी रहा हूँ  पता नहीं इस फ़िल्मी  दुनिया में आने के बाद कोई वापस लौट कर अपने घर गया हो। 

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