गुमनाम ज़िन्दगी
तेजसिंह शहर में एक ख्याति प्राप्त स्कूल में पढता हैं। कक्षा में प्रथम आना ही नहीं हर प्रतियोगिता में भाग लेकर उसमे अपने आप को सर्वोत्तम साबित करने की ठान रखी थी। पूरा स्कूल उसकी इस सफलता के कारण उसका दीवाना था। तेजसिंह को भी अपने इस बात का घमंड था। स्कूल की किसी भी प्रतियोगिता या परीक्षा में अपना स्थान प्रथम मानता था। स्कूल समाप्त करने के बाद अपने शहर के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में उसको आराम से दाखिला मिल गया। कॉलेज वाले भी तेजसिंह को अपना विध्यार्थी पाकर फुले नहीं समां रहे थे। प्रथम वर्ष में ही उसने पुराने सर्वोच्च अंको को तोड़ते हुए पुरे के पुरे अंक ले आया। पूरा शहर और उसके माता पिता गर्व महसूस कर रहे थे। कॉलेज के खेलकूद की सभी टीमों में उसका अच्छा खासा यागदान रहता हैं। कॉलेज के दूसरे वर्ष में उसी की कक्षा की एक लड़की ने उससे ज्यादा अंक लाकर सबको अचम्भित कर दिया। पहली बार किसी से मात खायी वो भी लड़की से। एक बार तो तेजसिंह को कॉलेज की अंकतालिका पर विश्वाश नहीं हुआ। पुनः मूल्यांकन से भी कोई फायदा नहीं हुआ तो उसे उस लड़की के साथ बतमीजी कर ली। दोनों में काफी बहस बाज़ी भी हुयी मगर लड़की ने उसे हर बात का मुंह तोड़ जवाब दिया। घबराया हुआ तेजसिंह नाखूनों को चबाता हुआ वहा से चला तो गया मगर उसको हार पसंद नहीं थी अब उस लड़की को अंतिम वर्ष में किसी भी कीमत पर पीछे धकेलना हैं। इसी तरह की बातों में उलझने के कारण कॉलेज की खेलकूद में भी उसका ध्यान नहीं रहा। सभी ने ये कहना शुरू कर दिया की तेजसिंह का अब वक्त ख़त्म हो गया। उसके कुछ यार दोस्त इस सबका कारण वो लड़की ही बताते जिससे तेजसिंह को उस लड़की से बहुत ज्यादा घृणा हो गयी।रात दिन उसी लड़की का ध्यान करने लगा। अभी अंतिम वर्ष की परीक्षा में कुछ समय हैं। तेजसिंह के दोस्तों ने अभी से उस लड़की को सबक सिखाने का कहना शुरू कर दिया। इस बात की भनक जब उसके पिताजी को पता चली तो उन्होंने तेजसिंह को समझाया की ज्यादा मेहनत करोगे तो वापस अपना स्थान प्राप्त कर लोगे वर्ना अपनी ज़िन्दगी के साथ उसकी भी ज़िन्दगी बर्बाद करोगे और अगर ऐसा हुआ तो मेरे घर में कोई जगह नहीं हैं।
तेजसिंह चुपचाप सुनता रहा। उसे लगा की पापा सही कह रहे हैं इसलिए अब मैं अपनी पढ़ाई की तरफ ध्यान दूंगा। मगर जब दोस्तों से वापस मिला तो उन्होंने डराया की अगर तुम कम अंक लेकर आ गए तब क्या करोगे और ये अंतिम वर्ष भी हैं। तेजसिंह को किसी की भी बात समझ नहीं आ रही थी। दोस्तों ने डरा भी दिया। उसने दोस्तों की बात मानते हुए उस लड़की को पढ़ाई से ध्यान हटाने के लिए तरीके सोचने लगा। कॉलेज जाते वक्त बदमाश लड़को को पीछे लगाना शुरू किया मगर कोई फर्क नहीं पड़ा। वो अपने भाई की साथ आने जाने लगी। लाइब्रेरी में उसे दोस्त सताने लगे मगर कॉलेज में शिकायत होने की वजह से वहा भी दाल नहीं गली। एक दोस्त ने उसे बदनाम करने की बात कही। तेजसिंह इस पर नाराज़ हुआ मगर अपने को प्रथम स्थान देखने के लिए वो ये भी करने को तैयार हुआ। सभी दोस्त किस प्रकार से उस लड़की को बदनाम करे जिससे वो घर पर भी पढ़ाई नहीं कर सके। वो सिर्फ लड़कियों से बात करती थी इसलिए कोई कमज़ोरी मिली नहीं। और ज्यादातर वो लायब्रेरी में ही मिलती थी। सभी हैरान परेशान की किस तरह बदनाम किया जाये.तेजसिंह अपनी पढाई छोड़ कर पुरे वक्त इसी में रहता था। थोड़े दिनों बाद उसके एक दोस्त ने लायब्रेरी में उस लड़की को लायब्रेरी के सहायक से काफी देर तक बात करते देखा था। वो सहायक अधेड़ उम्र का था मगर रहता लड़कों की तरह। एक दम बनठन कर। उस दोस्त ने तेजसिंह को ये बात बताई। सभी दोस्तों को लेकर वो सीधा लायब्रेरी में गया और उस लड़की का इंतज़ार करने लगा। जब वो लड़की आई तो उसी सहायक से हसते हुए बात की दोनों काफी देर तक धीरे धीरे बोलते रहे थोड़ी देर बाद वो लाइब्रेरियन उस लड़की को कुछ किताबें निकाल कर दी। तेजसिंह ने ताना मारते हुए उससे बोला की हमे भी कुछ किताबें इतने प्यार से निकाल कर दिया करो। आप हमे तो अपने आप किताब निकालने को कहते हैं और इसको एक नहीं तीन तीन चार चार किताबें निकाल कर देते हैं। इस बात पर दोनों में बहस हो जाती हैं। बात जब प्रिंसिपल साब के पास पहुंचती हैं तो सभी लड़के तेजसिंह का पक्ष लेते हुए कहते हैं की ये लाइब्रेरियन उस लड़की को बिना इज्जाजत के ढेरों किताबें देता हैं और हम लोगो को मना कर देता हैं। जरूर इसका उस लड़की से कोई सम्बन्ध हैं। उस लड़की को बुलाया गया और प्रिंसिपल ने सिर्फ इतना पूछा की ये आपको किताबें निकल कर देता हैं तो उसने कहा की सभी की तरह मुझे भी किताबें निकाल कर देते हैं। काफी बहस के बाद प्रिंसिपल ने दोनों को हिदायत दी की कोई भी लाइब्रेरी से किताब बहार लेकर नहीं जायेगा और खुद को ही किताब ढूंढनी होगी और वापस वही रखनी होगी। कोई किसी की सहायता नहीं करेगा। तेजसिंह और उनके दोस्तों को एक मुद्दा मिल गया। अब उसके दोस्त उसको और लायब्रेरियन को कॉलेज में खूब बदनाम करते। उस लड़की ने धीरे धीरे कॉलेज आना बंद कर दिया। लायब्रेरियन के घर तक जब बात पहुंची तो वहा भी बड़े झगड़े होने के कारण लायब्रेरियन ने कुछ समय के लिए अवकाश ले लिया। इस तरह से ये बदनामी और बढ़ गयी। तेजसिंह भी अब रोज़ कॉलेज में अपने दोस्तों के साथ इधर उधर डोलता रहता था। अंतिम वर्ष की जब परीक्षा नज़दीक आई तो तेजसिंह को पढ़ाई का ख्याल आया। जैसे तैसे उसने अपनी पढ़ाई शुरू की। पढ़ाई में पहले से होशियार होने के कारण ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी वापस लाइन में आने में। जब परीक्षा शुरू हुयी तब उसे वो लड़की याद आई की वो भी क्या परीक्षा देने आएगी या नहीं। बड़ी मुश्किल से वो पहला परचा दे पाया क्योकि उसे अब अहसास हुआ की उसने उसके साथ गलत किया। सभी परीक्षा पेपर तक वो उसी को ढूंढता मगर वो कही भी नहीं दिखाई दी। जब परीक्षा परिणाम आया तो तेजसिंह का पूरी कॉलेज में आठवें नंबर आया। पहले दोनों कोई और ही निकले। तीसरे नंबर पर उस लड़की का नाम था। भगवान् को धन्यवाद दिया की उसने कमसेकम वो तीसरे नंबर पर तो आ गयी। वो उस लड़की से माफ़ी मांगना चाहता था था। जब पता किया तो पता चला की वो अब शहर छोड़ चुकी हैं और उसका भाई परिणाम लेने आया हैं और भाई ने कहा की वो कहा गयी ये नहीं बताया। तेजसिंह सोचने लगा की आज मेरी पढ़ाई के साथ उसकी भी पढ़ाई मेने ख़राब कर डाली। उसके पिताजी ने उसे कुछ नहीं कहा और सिर्फ घर से चले जाने को बोला। अपना कुछ सामान लेकर वो रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़ा। थोड़े से पैसे जब में थे। जो पहली ट्रैन आई वो उसमे सामान्य श्रेणी में बैठ गया। अपने विचारों में खोया हुआ था इसलिए वो टिकट लेना भूल गया। जब टी टी ने टिकट माँगा तो कुछ बोल नहीं पाया। वो अब गुमसुम रहने लगा। टी टी ने उसको रेलवे पुलिस को सौंप दिया। पढ़ा लिखा दिखने के कारण पुलिस वालो ने दो चार दिन जेल में रख कर छोड़ दिया। तेजसिंह वहा से निकल कर एक छोटे से गॉव में चला गया। वह एक निजी पाठशाला में पढ़ाने लगा। थोड़े बहुत पैसे मिलते उससे अपना गुजारा कर लेता था। दाढ़ी और बाल लम्बे करके वो उम्र से ज्यादा बड़ा दिखने लगा। सभी उसे सिंह साब ही कहते और बच्चे मास्टरजी। कुछ समय बीतने के बाद तेजसिंह को वो गॉव ही अपना गॉव लगने लगा था। एक दिन वहा कलेक्टर साहिबा का आना हुआ। गॉव में दो ही स्कूल थे। एक सरकारी और एक निजी। निजी स्कूल में तेजसिंह पढ़ाता था। दोनों स्कूल में ज्यादा बच्चे नहीं थे इसलिए कलेक्टर साहिबा के सामने दोनों स्कूल के बच्चों को इकट्टा किया गया। कलेक्टर साहिबा रीना देवी जब सभी बच्चों से मिली और उन्होंने परेशानी पूछी तो सरकारी स्कूल के बच्चों ने सिंह साब का नाम लिया की वो हमे घर पर मुफ्त में पढ़ाते हैं यदि वो सरकारी स्कूल में पढाए तो परिणाम और अच्छा हो सकता हैं। गणमान्य लोगो से कोई परेशानी का सवाल किया तो उन्होंने कहा की हमारे सिंह साब हर समस्या का समाधान कर देते हैं। खेल कूद से लेकर घर की समस्या तक सभी आराम से सुलझा देते हैं। यहाँ के बी.डी.ओ. भी उन्ही से सलाह लेते हैं। जब कलेक्टर साहिबा ने ये सुना तो उन्होंने सिंह साब का पूछा की वो कहा हैं तो पता चला की वो पास के गॉव में गए हैं किसी काम से। कलेक्टर ने उन्हें अपने ऑफिस में भेजने का कह कर चली गयी। शाम के समय जब सिंह साब आये तो सभी ने कलेक्टर साहिबा के ऑफिस में जाने को बोल। सिंह साब बहाना करके बात को गोलमोल कर गए। कलेक्टर साहिबा के सामने नहीं आना चाहते थे। ये वही लड़की हैं जो कॉलेज में तेजसिंह के कारन बदनाम हुयी इसलिए वो अब घबरा रहे थे। कलेक्टर ऑफिस से कुछ दिन बाद फिर बुलावा आया मगर वो नहीं गए। सभी को इधर उधर का कह कर टालमटोल कर देते। कुछ समय बाद एक दिन किसी नेता का अचानक दौरा हुआ। नेताजी के साथ कलेक्टर साहिबा भी आई। स्कूल में सिंह साब पढ़ाई करवा रहे थे। जब निजी स्कूल का निरिक्षण करने नेताजी के साथ कलेक्टर साहिबा पहुंची तो उन्होंने सिंह साब को बुलवाया। सिंह साब मेले कुचले पुराने कपडे पहने ,दाढ़ी बड़ी हुयी और आँखों में चश्मा लगाए जब ऑफिस में गए तो कलेक्टर साहिबा को कोई पागल सा लगा। उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। नेताजी ने उन्हें पूछताझ की। मगर सिंह साब कुछ नहीं बोले। नेताजी ने उनके माँ बाप घर बार सभी के सवाल एक साथ कर डाले। सिंह साब जानबूझ कर खाँसते हुए दबी हुयी आवाज़ में उत्तर देने लगे। रीना देवी कुछ ज्यादा ध्यान नहीं दे दूसरे अफसरों से बात करने लगी। नेताजी ने सिंह साब को बोले की अगर आपके पास कोई डिग्री हो तो आपको यही सरकारी स्कूल का अध्यापक बना देते हैं।
सिंह साब ने जवाब दिया की वो सभी डिग्री आदि खो गयी हैं अगर मिल जाएगी तो पंहुचा दूंगा कलेक्टर ऑफिस में। कलेक्टर साहिबा को नेताजी ने हिदायत देकर वहा से जाने लगे। कलेक्टर साहिबा जब सीढ़ियां उतर रहि थी तो पांव फिसल गया जिससे वो गिर पड़ी। दो सीढ़ियां ही थी इसलिए ज्यादा चोट नहीं लगी बस पैर मूड गया। उन्हें सरपंचजी के घर लाया गया। सभी कलेक्टर साहिबा की खातिरदारी करने लगे। सरपंच जी ने सिंह साब को कहा की आप कलेक्टर साहिबा का पैर थोड़ा देख ले जब तक शहर से डॉ नहीं आ जाता हैं। सिंह साब रीना देवी के सामने नहीं जाना चाहते थे मगर नीरा देवी को दर्द हो रहा था इसलिए मज़बूरी से उनके पास जाना पड़ा। जब वो पैर की मालिश करते करते हुए सही कर रहे थे तब रीनादेवी के मुंह से आह निकल पड़ी। तेजसिंह ने घबरा कर बोला की कही ज्यादा दर्द तो नहीं हुआ। रीना देवी को ये आवाज़ बहुत ही जानी पहचानी सी लगी। रीना देवी ने कहा की दर्द तो हुआ मगर अब आराम हैं। वो खड़ी होकर चलने की कोशिश करने लगी। तेजसिंह ने हाथ पकड़ कर सहारा दिया। रीना देवी को अजीब सा लगा की ये कोई और ही आदमी हे जो छुप कर यहाँ रहा रहा हैं। वो आवाज़ को पहचान तो गयी मगर उसका नाम ध्यान नहीं आ रहा था। वो सिंह साब से ज्यादा बातें करने लगी जिससे उसकी असलियत पता चल सके। तेजसिंह एकदम से समझ गए उन्होंने अब हा ना में उतार देना शुरू कर दिया। तेज़ सिंह की बचपन से एक आदत हैं की वो जब घबराते हैं या छुपना चाहते हैं तो वो अपने नाखूनों को खाना शुरू करते हैं और बीच बीच में नाक को अंगुली से रगड़ते हैं। रीना देवी इस तरीका का बर्ताव देख कर अपनी यादों को तेज़ कर रही थी की ऐसा कौन करता था जिसको वो अच्छे से जानती हैं। उस समय तेजसिंह भी यही कर रहा था। सिंह साब को धन्यवाद दे कर वो अपनी कार में बैठ गयी मगर उन्हें सिंह साब की आदतें और सिंह साब बार बार परेशान कर रहे थे की ये आदमी कौन हैं जो मेरे इतना नजदीक हैं और मैं पहचान नहीं पा रही हूँ । कार जब गॉव से बहार निकली कि उन्हें सारी बातें याद आ गयी। उन्होंने कार को वापस गॉव की तरफ लेने को बोला। सरपंच जी कलेक्टर साहिबा की कार को वापस आते देखा तो डरने लगे। कलेक्टर साहिबा ने थोड़ा काम होने का कहा और वो कुछ देर सरपंचजी के घर रुकने का बोला। रीना देवी ने कहा की सरपंचजी सिंह साब को यहाँ बुलवाए और ये मत बताना की हमने बुलाया हैं। कार को मरम्मत का कह कर भिजवा दी। सिंह साब थोड़ी देर में वहा आ गए। एक कमरे में सरपंच जी और सिंह साब बात कर रहे थे तो अचानक रीना देवी वहा आ गयी और सिंह साब को तेजसिंह के नाम से आवाज़ दी। .अपना नाम सुनते ही घबराहट में तेजसिंह खड़े हो कर जी मैडम बोले और अपने नाखूनों को खाने लगे और नाक पर अंगुली रगड़ने लगे।सरपंच जी भी हैरान हो गए की ये क्या बात हुयी सिंह साब को इतने घबराये हुए और रीना देवी ने ये तेज़ सिंह नाम से इन्हे बुलाया।रीना देवी ने उन्हें बोला की आपने एस क्यों किया तेजसिंह ने रुकते रुकते बोला। की उन्होंने जो भी किया आवेश में आ कर किया इसलिए उन्हें माफ़ कर दे। रीना देवी बोली की जब मेरे भाई परिणाम लेकर आये तब आपसे मिले और उन्होंने आपकी आँखों में वो शर्म देखि थी। कुछ समय बाद मैं जब वापस तुमसे मिलने आई तब तक तुम घर से निकाले जा चुके थे। और आज इतने वर्षो से गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहे हो। तुम इतनी जल्दी हार मान गए। मैंने कॉलेज आना इसलिए बंद किया की घर बैठे ज्यादा पढ़ाई कर सकु मगर हर वक्त तुम याद आ जाते। सोचती कि इतना समझदार विध्यार्थी छोटी मोटी बातों में कैसे आ गया। जबकि मेने सोचा की हम एक दूजे की सहायता करते रहेंगे जिससे कॉलेज का और हमारा नाम उच्चा हो जायेगा। मगर तुम्हे अपने बेकार दोस्तों की बातों का ही ध्यान रहा। उन्ही मेसे तुम्हारा एक दोस्त आज मेरा ड्राइवर हैं। आपके पिताजी ने भी तुम्हे समझाया। वो मेरे घर आकर माफ़ी मांग कर गए। इतने अच्छे माँ बाप मिलने के बाद तुम कैसे दोस्तों की बातों में आ गए। और जब समझ आई तो यहाँ छुप कर बैठ गए। अगर डटकर मुकाबला करते तो शायद इतने बड़े आदमी बनते ये सोचा हैं तुमने । अब भी कुछ नहीं बिगड़ा हैं वापस तयारी करके आज भी कुछ बन सकते हो ,घर जाओ। तुम्हारी। माताजी और पिताजी दोनों तुम्हारे इंतज़ार कर रहे हैं। मैं हर दूसरे दिन उन्हें संभालती हूँ। तेजसिंह ने कहा की अब बहुत देर हो चुकी हैं। जबसे आप शहर छोड़ कर गयी में भी आपको याद करता रहा की आप की हालात से गुजर रही होंगी। कही गुमनाम ज़िन्दगी बसर कर रही होंगी इसलिए मैं भी यहाँ गुमनाम रहने लगा। रीना देवी ने कहा की। ...... मेरे लिए इतना त्याग। क्या बात हैं सिंह साब आप तो बहुत बड़े छुपे रुस्तम निकले।कोई बात नहीं आपके इस त्याग के कारण हम दोनों मिल कर आपके माताजी पिताजी की सेवा करते हैं।और एक बात मेने अभी तक शादी नहीं की हैं आपके खातिर क्योकि इस बदनाम लड़की से शादी कौन करेगा। क्या तुम करोगे मुझसे शादी। आपके माताजी ने तो कबूल कर लिया हैं। तेजसिंह ने फिर नाखूनों को चबाना और अंगुली को नाक पर रगड़ने लगे तो रीना देवी को जोर की हसी आ गयी। सरपंच जी अभी भी कुछ नहीं समझ सके। दोनों एक ही कार में वापस शहर की तरफ और अपने ज़िन्दगी की नयी शुरुआत करने निकल पड़े।
तेजसिंह शहर में एक ख्याति प्राप्त स्कूल में पढता हैं। कक्षा में प्रथम आना ही नहीं हर प्रतियोगिता में भाग लेकर उसमे अपने आप को सर्वोत्तम साबित करने की ठान रखी थी। पूरा स्कूल उसकी इस सफलता के कारण उसका दीवाना था। तेजसिंह को भी अपने इस बात का घमंड था। स्कूल की किसी भी प्रतियोगिता या परीक्षा में अपना स्थान प्रथम मानता था। स्कूल समाप्त करने के बाद अपने शहर के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में उसको आराम से दाखिला मिल गया। कॉलेज वाले भी तेजसिंह को अपना विध्यार्थी पाकर फुले नहीं समां रहे थे। प्रथम वर्ष में ही उसने पुराने सर्वोच्च अंको को तोड़ते हुए पुरे के पुरे अंक ले आया। पूरा शहर और उसके माता पिता गर्व महसूस कर रहे थे। कॉलेज के खेलकूद की सभी टीमों में उसका अच्छा खासा यागदान रहता हैं। कॉलेज के दूसरे वर्ष में उसी की कक्षा की एक लड़की ने उससे ज्यादा अंक लाकर सबको अचम्भित कर दिया। पहली बार किसी से मात खायी वो भी लड़की से। एक बार तो तेजसिंह को कॉलेज की अंकतालिका पर विश्वाश नहीं हुआ। पुनः मूल्यांकन से भी कोई फायदा नहीं हुआ तो उसे उस लड़की के साथ बतमीजी कर ली। दोनों में काफी बहस बाज़ी भी हुयी मगर लड़की ने उसे हर बात का मुंह तोड़ जवाब दिया। घबराया हुआ तेजसिंह नाखूनों को चबाता हुआ वहा से चला तो गया मगर उसको हार पसंद नहीं थी अब उस लड़की को अंतिम वर्ष में किसी भी कीमत पर पीछे धकेलना हैं। इसी तरह की बातों में उलझने के कारण कॉलेज की खेलकूद में भी उसका ध्यान नहीं रहा। सभी ने ये कहना शुरू कर दिया की तेजसिंह का अब वक्त ख़त्म हो गया। उसके कुछ यार दोस्त इस सबका कारण वो लड़की ही बताते जिससे तेजसिंह को उस लड़की से बहुत ज्यादा घृणा हो गयी।रात दिन उसी लड़की का ध्यान करने लगा। अभी अंतिम वर्ष की परीक्षा में कुछ समय हैं। तेजसिंह के दोस्तों ने अभी से उस लड़की को सबक सिखाने का कहना शुरू कर दिया। इस बात की भनक जब उसके पिताजी को पता चली तो उन्होंने तेजसिंह को समझाया की ज्यादा मेहनत करोगे तो वापस अपना स्थान प्राप्त कर लोगे वर्ना अपनी ज़िन्दगी के साथ उसकी भी ज़िन्दगी बर्बाद करोगे और अगर ऐसा हुआ तो मेरे घर में कोई जगह नहीं हैं।
तेजसिंह चुपचाप सुनता रहा। उसे लगा की पापा सही कह रहे हैं इसलिए अब मैं अपनी पढ़ाई की तरफ ध्यान दूंगा। मगर जब दोस्तों से वापस मिला तो उन्होंने डराया की अगर तुम कम अंक लेकर आ गए तब क्या करोगे और ये अंतिम वर्ष भी हैं। तेजसिंह को किसी की भी बात समझ नहीं आ रही थी। दोस्तों ने डरा भी दिया। उसने दोस्तों की बात मानते हुए उस लड़की को पढ़ाई से ध्यान हटाने के लिए तरीके सोचने लगा। कॉलेज जाते वक्त बदमाश लड़को को पीछे लगाना शुरू किया मगर कोई फर्क नहीं पड़ा। वो अपने भाई की साथ आने जाने लगी। लाइब्रेरी में उसे दोस्त सताने लगे मगर कॉलेज में शिकायत होने की वजह से वहा भी दाल नहीं गली। एक दोस्त ने उसे बदनाम करने की बात कही। तेजसिंह इस पर नाराज़ हुआ मगर अपने को प्रथम स्थान देखने के लिए वो ये भी करने को तैयार हुआ। सभी दोस्त किस प्रकार से उस लड़की को बदनाम करे जिससे वो घर पर भी पढ़ाई नहीं कर सके। वो सिर्फ लड़कियों से बात करती थी इसलिए कोई कमज़ोरी मिली नहीं। और ज्यादातर वो लायब्रेरी में ही मिलती थी। सभी हैरान परेशान की किस तरह बदनाम किया जाये.तेजसिंह अपनी पढाई छोड़ कर पुरे वक्त इसी में रहता था। थोड़े दिनों बाद उसके एक दोस्त ने लायब्रेरी में उस लड़की को लायब्रेरी के सहायक से काफी देर तक बात करते देखा था। वो सहायक अधेड़ उम्र का था मगर रहता लड़कों की तरह। एक दम बनठन कर। उस दोस्त ने तेजसिंह को ये बात बताई। सभी दोस्तों को लेकर वो सीधा लायब्रेरी में गया और उस लड़की का इंतज़ार करने लगा। जब वो लड़की आई तो उसी सहायक से हसते हुए बात की दोनों काफी देर तक धीरे धीरे बोलते रहे थोड़ी देर बाद वो लाइब्रेरियन उस लड़की को कुछ किताबें निकाल कर दी। तेजसिंह ने ताना मारते हुए उससे बोला की हमे भी कुछ किताबें इतने प्यार से निकाल कर दिया करो। आप हमे तो अपने आप किताब निकालने को कहते हैं और इसको एक नहीं तीन तीन चार चार किताबें निकाल कर देते हैं। इस बात पर दोनों में बहस हो जाती हैं। बात जब प्रिंसिपल साब के पास पहुंचती हैं तो सभी लड़के तेजसिंह का पक्ष लेते हुए कहते हैं की ये लाइब्रेरियन उस लड़की को बिना इज्जाजत के ढेरों किताबें देता हैं और हम लोगो को मना कर देता हैं। जरूर इसका उस लड़की से कोई सम्बन्ध हैं। उस लड़की को बुलाया गया और प्रिंसिपल ने सिर्फ इतना पूछा की ये आपको किताबें निकल कर देता हैं तो उसने कहा की सभी की तरह 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वो कही भी नहीं दिखाई दी। जब परीक्षा परिणाम आया तो तेजसिंह का पूरी कॉलेज में आठवें नंबर आया। पहले दोनों कोई और ही निकले। तीसरे नंबर पर उस लड़की का नाम था। भगवान् को धन्यवाद दिया की उसने कमसेकम वो तीसरे नंबर पर तो आ गयी। वो उस लड़की से माफ़ी मांगना चाहता था था। जब पता किया तो पता चला की वो अब शहर छोड़ चुकी हैं और उसका भाई परिणाम लेने आया हैं और भाई ने कहा की वो कहा गयी ये नहीं बताया। तेजसिंह सोचने लगा की आज मेरी पढ़ाई के साथ उसकी भी पढ़ाई मेने ख़राब कर डाली। उसके पिताजी ने उसे कुछ नहीं कहा और सिर्फ घर से चले जाने को बोला। अपना कुछ सामान लेकर वो रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़ा। थोड़े से पैसे जब में थे। जो पहली ट्रैन आई वो उसमे सामान्य श्रेणी में बैठ गया। अपने विचारों में खोया हुआ था इसलिए वो टिकट लेना भूल गया। जब टी टी ने टिकट माँगा तो कुछ बोल नहीं पाया। वो अब गुमसुम रहने लगा। टी टी ने उसको रेलवे पुलिस को सौंप दिया। पढ़ा लिखा दिखने के कारण पुलिस वालो ने दो चार दिन जेल में रख कर छोड़ दिया। तेजसिंह वहा से निकल कर एक छोटे से गॉव में चला गया। वह एक निजी पाठशाला में पढ़ाने लगा। थोड़े बहुत पैसे 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उन्हें अपने ऑफिस में भेजने का कह कर चली गयी। शाम के समय जब सिंह साब आये तो सभी ने कलेक्टर साहिबा के ऑफिस में जाने को बोल। सिंह साब बहाना करके बात को गोलमोल कर गए। कलेक्टर साहिबा के सामने नहीं आना चाहते थे। ये वही लड़की हैं जो कॉलेज में तेजसिंह के कारन बदनाम हुयी इसलिए वो अब घबरा रहे थे। कलेक्टर ऑफिस से कुछ दिन बाद फिर बुलावा आया मगर वो नहीं गए। सभी को इधर उधर का कह कर टालमटोल कर देते। कुछ समय बाद एक दिन किसी नेता का अचानक दौरा हुआ। नेताजी के साथ कलेक्टर साहिबा भी आई। स्कूल में सिंह साब पढ़ाई करवा रहे थे। जब निजी स्कूल का निरिक्षण करने नेताजी के साथ कलेक्टर साहिबा पहुंची तो उन्होंने सिंह साब को बुलवाया। सिंह साब मेले कुचले पुराने कपडे पहने ,दाढ़ी बड़ी हुयी और आँखों में चश्मा लगाए जब ऑफिस में गए तो कलेक्टर साहिबा को कोई पागल सा लगा। उन्होंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। नेताजी ने उन्हें पूछताझ की। मगर सिंह साब कुछ नहीं बोले। नेताजी ने उनके माँ बाप घर बार सभी के सवाल एक साथ कर डाले। सिंह साब जानबूझ कर खाँसते हुए दबी हुयी आवाज़ में उत्तर देने लगे। रीना देवी कुछ ज्यादा ध्यान नहीं दे दूसरे अफसरों से बात करने लगी। नेताजी ने सिंह साब को बोले की अगर आपके पास कोई डिग्री हो तो आपको यही सरकारी स्कूल का अध्यापक बना देते हैं।
सिंह साब ने जवाब दिया की वो सभी डिग्री आदि खो गयी हैं अगर मिल जाएगी तो पंहुचा दूंगा कलेक्टर ऑफिस में। कलेक्टर साहिबा को नेताजी ने हिदायत देकर वहा से जाने लगे। कलेक्टर साहिबा जब सीढ़ियां उतर रहि थी तो पांव फिसल गया जिससे वो गिर पड़ी। दो सीढ़ियां ही थी इसलिए ज्यादा चोट नहीं लगी बस पैर मूड गया। उन्हें सरपंचजी के घर लाया गया। सभी कलेक्टर साहिबा की खातिरदारी करने लगे। सरपंच जी ने सिंह साब को कहा की आप कलेक्टर साहिबा का पैर थोड़ा देख ले जब तक शहर से डॉ नहीं आ जाता हैं। सिंह साब रीना देवी के सामने नहीं जाना चाहते थे मगर नीरा देवी को दर्द हो रहा था इसलिए मज़बूरी से उनके पास जाना पड़ा। जब वो पैर की मालिश करते करते हुए सही कर रहे थे तब रीनादेवी के मुंह से आह निकल पड़ी। तेजसिंह ने घबरा कर बोला की कही ज्यादा दर्द तो नहीं हुआ। रीना देवी को ये आवाज़ बहुत ही जानी पहचानी सी लगी। रीना देवी ने कहा की दर्द तो हुआ मगर अब आराम हैं। वो खड़ी होकर चलने की कोशिश करने लगी। तेजसिंह ने हाथ पकड़ कर सहारा दिया। रीना देवी को अजीब सा लगा की ये कोई और ही आदमी हे जो छुप कर यहाँ रहा रहा हैं। वो आवाज़ को पहचान तो गयी मगर उसका नाम ध्यान नहीं आ रहा था। वो सिंह साब से ज्यादा बातें करने लगी जिससे उसकी असलियत पता चल सके। तेजसिंह एकदम से समझ गए उन्होंने अब हा ना में उतार देना शुरू कर दिया। तेज़ सिंह की बचपन से एक आदत हैं की वो जब घबराते हैं या छुपना चाहते हैं तो वो अपने नाखूनों को खाना शुरू करते हैं और बीच बीच में नाक को अंगुली से रगड़ते हैं। रीना देवी इस तरीका का बर्ताव देख कर अपनी यादों को तेज़ कर रही थी की ऐसा कौन करता था जिसको वो अच्छे से जानती हैं। उस समय तेजसिंह भी यही कर रहा था। सिंह साब को धन्यवाद दे कर वो अपनी कार में बैठ गयी मगर उन्हें सिंह साब की आदतें और सिंह साब बार बार परेशान कर रहे थे की ये आदमी कौन हैं जो मेरे इतना नजदीक हैं और मैं पहचान नहीं पा रही हूँ । कार जब गॉव से बहार निकली कि उन्हें सारी बातें याद आ गयी। उन्होंने कार को वापस गॉव की तरफ लेने को बोला। सरपंच जी कलेक्टर साहिबा की कार को वापस आते देखा तो डरने लगे। कलेक्टर साहिबा ने थोड़ा काम होने का कहा और वो कुछ देर सरपंचजी के घर रुकने का बोला। रीना देवी ने कहा की सरपंचजी सिंह साब को यहाँ बुलवाए और ये मत बताना की हमने बुलाया हैं। कार को मरम्मत का कह कर भिजवा दी। सिंह साब थोड़ी देर में वहा आ गए। एक कमरे में सरपंच जी और सिंह साब बात कर रहे थे तो अचानक रीना देवी वहा आ गयी और सिंह साब को तेजसिंह के नाम से आवाज़ दी। .अपना नाम सुनते ही घबराहट में तेजसिंह खड़े हो कर जी मैडम बोले और अपने नाखूनों को खाने लगे और नाक पर अंगुली रगड़ने लगे।सरपंच जी भी हैरान हो गए की ये क्या बात हुयी सिंह साब को इतने घबराये हुए और रीना देवी ने ये तेज़ सिंह नाम से इन्हे बुलाया।रीना देवी ने उन्हें बोला की आपने एस क्यों किया तेजसिंह ने रुकते रुकते बोला। की उन्होंने जो भी किया आवेश में आ कर किया इसलिए उन्हें माफ़ कर दे। रीना देवी बोली की जब मेरे भाई परिणाम लेकर आये तब आपसे मिले और उन्होंने आपकी आँखों में वो शर्म देखि थी। कुछ समय बाद मैं जब वापस तुमसे मिलने आई तब तक तुम घर से निकाले जा चुके थे। और आज इतने वर्षो से गुमनामी की ज़िन्दगी जी रहे हो। तुम इतनी जल्दी हार मान गए। मैंने कॉलेज आना इसलिए बंद किया की घर बैठे ज्यादा पढ़ाई कर सकु मगर हर वक्त तुम याद आ जाते। सोचती कि इतना समझदार विध्यार्थी छोटी मोटी बातों में कैसे आ गया। जबकि मेने सोचा की हम एक दूजे की सहायता करते रहेंगे जिससे कॉलेज का और हमारा नाम उच्चा हो जायेगा। मगर तुम्हे अपने बेकार दोस्तों की बातों का ही ध्यान रहा। उन्ही मेसे तुम्हारा एक दोस्त आज मेरा ड्राइवर हैं। आपके पिताजी ने भी तुम्हे समझाया। वो मेरे घर आकर माफ़ी मांग कर गए। इतने अच्छे माँ बाप मिलने के बाद तुम कैसे दोस्तों की बातों में आ गए। और जब समझ आई तो यहाँ छुप कर बैठ गए। अगर डटकर मुकाबला करते तो शायद इतने बड़े आदमी बनते ये सोचा हैं तुमने । अब भी कुछ नहीं बिगड़ा हैं वापस तयारी करके आज भी कुछ बन सकते हो ,घर जाओ। तुम्हारी। माताजी और पिताजी दोनों तुम्हारे इंतज़ार कर रहे हैं। मैं हर दूसरे दिन उन्हें संभालती हूँ। तेजसिंह ने कहा की अब बहुत देर हो चुकी हैं। जबसे आप शहर छोड़ कर गयी में भी आपको याद करता रहा की आप की हालात से गुजर रही होंगी। कही गुमनाम ज़िन्दगी बसर कर रही होंगी इसलिए मैं भी यहाँ गुमनाम रहने लगा। रीना देवी ने कहा की। ...... मेरे लिए इतना त्याग। क्या बात हैं सिंह साब आप तो बहुत बड़े छुपे रुस्तम निकले।कोई बात नहीं आपके इस त्याग के कारण हम दोनों मिल कर आपके माताजी पिताजी की सेवा करते हैं।और एक बात मेने अभी तक शादी नहीं की हैं आपके खातिर क्योकि इस बदनाम लड़की से शादी कौन करेगा। क्या तुम करोगे मुझसे शादी। आपके माताजी ने तो कबूल कर लिया हैं। तेजसिंह ने फिर नाखूनों को चबाना और अंगुली को नाक पर रगड़ने लगे तो रीना देवी को जोर की हसी आ गयी। सरपंच जी अभी भी कुछ नहीं समझ सके। दोनों एक ही कार में वापस शहर की तरफ और अपने ज़िन्दगी की नयी शुरुआत करने निकल पड़े।
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