क्या कसूर उसका
मेरा हर दूसरे तीसरे दिन शर्मा जी के घर आना जाना होता था। शर्माजी के घर में हरदम चहल कदमी रहती हैं। शर्माजी का परिवार और उनके छोटे भाई का परिवार एक ही मकान में रहते हैं। दोनों के परिवार हसंता खेलता रहता हैं। वहां चार छोटे लड़के हैं। शर्माजी के एक लड़का और एक लड़की हैं बाकि तीन लड़के शर्माजी के छोटे भाई के पुत्र हैं। सारे लड़के घर आंगन बाहर बाहर खेलते घूमते फिरते भी हैं मगर लड़की गुड़िया हमेशा उन्हें देखती रहती हैं। अगर वो ज़िद भी करती हैं तो उसे लड़की होना कहकर रोक लिया जाता हैं ,ये मेने काफी बार नोटिस किया मगर मैं बोल कुछ नहीं सकता हूँ। आज सभी घर के लड़के अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने जा रहे हैं और वो ज़िद कर रही हैं की वो भी अपनी सहेलियों के साथ मूवी देखने का विचार कर रही हैं इसलिए उसे भी जाने दिया जाये। शर्माजी ने डांट कर उसे घर के अंदर और अपनी मर्यादा में रहने का बोलै साथ में उसकी मम्मी को भी गुड़ियाँ को सम्भाले का जोर दिया। ऐसा कितनी बार हुआ था मगर शर्माजी किसी भी कीमत पर उसे घर की चार दिवारी में ही रखते। इस बात का उसकी माँ को बहुत दुःख था क्योकि इस घर में किसी भी स्त्री को या लड़की बाहर घूमने फिरने की इज़ाज़त नहीं हैं। यहाँ तक की घर के बाहर भी या किसी सड़क पर खड़े होकर किसी से भी बात नहीं कर सकती हैं। गुड़िया पढने लिखने में सभी भाई बहन में होशियार थी मगर उसे कवर घर में रह कर ही अपनी पढ़ाई करनी हैं। मेरी एक बिटिया हैं जिसे मैं अपना लड़का समझता हूँ और उसे हर बात की छूट दे रखी हैं। और वो मेरे विश्वाश के साथ हमेशा अच्छे नंबर से पास हो रही हैं और खेल कूद में भी भाग ले रही हैं। मेने ये बात शर्माजी को नहीं बताई क्योकि फालतू में एक दो उपदेश देंगे और मैं मेरी बिटिया को स्वतंत्र रखना चाहता हूँ। गुड़िया और मेरी चुन्नी दोनों एक ही कक्षा में हैं मगर स्कूल अलग अलग हैं इसलिए उनका कभी मिलाप नहीं हुआ। १२ कक्षा का परिणाम आया। क्योकि यह दोपहर में घोषित हुआ इसलिए मुझे इसका कतिई ध्यान नहीं था। किसी काम से जब शर्मा जी के घर गया तो पता चला की परीक्षा परिणाम आया हैं। मैं मन में अपनी चुनी के लिए सोच ही रहा था की गुड़िया की माताजी गुड़िया के पास होने की खबर ले आई। आज वो प्रतम श्रेणी से उत्तीर्ण हुयी हैं इसलिए उसे अब अच्छे कॉलेज में आसानी से दाखिला मिल जायेगा। ये बात जब गुड़िया की माताजी और गुड़िया ने कही तो शर्माजी को गुस्सा आ गया। उन्होंने कॉलेज नहीं ससुराल जाने की बात कही की अब इसके शादी की बात करो न की कॉलेज की। काफी बहस के बाद भी शर्माजी नहीं माने। हार कर गुड़िया की माताजी ने जो उचित समझो वो कह कर चली गयी। गुड़िया को आगे पढना था मगर शर्माजी को कतई पसंद नहीं। गुड़िया ने कहा की अपने शहर में जो प्रथम आया वो भी लड़की ही हैं। इस पर शर्माजी ने उस लड़की और उसके मत पिता को भला बुरा कहा की आगे जाकर पछतावा होगा उन्हें अपनी लड़की पढ़ाने का। जिज्ञाशावस मैंने गुड़िया नाम पूछ लिया तो उसने बताया की कोई चुन्नीदेवी पुरे राज्य में प्रथम आई हैं। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं मगर इस वक्त शर्मा जी तेवर देख कर चुप रहना ही उचित समझा। घर जाकर मैंने अपनी चुन्नी को जब देखा तो अपने आपमें गर्व महसूस हुआ। चुन्नी की सहेलियां और हमारे रिस्तेदार सभी घर आकर बढ़ाईं देने लगे। थोड़े दिन बाद शर्मा जी के घर से न्योता आया की गुड़िया की सगाई तय कर दी हैं और हमे सभी को बुलाया हैं। मैं पुरे परिवार के साथ गया। गुड़िया के ससुराल वाले काफी इज्जतदार और पढ़े लिखे लोग हैं उनके घर में बहु बेटिया भी पढ़ी लिखी हैं। जब उन्होंने चुन्नी को वह देखा तो सभी उसके आगे पीछे घूमने लगे। शर्माजी को लड़की इतना खुल कर बात करना पसंद नहीं था मगर अपने घर आये मेहमान का वो अनादर नहीं करना चाहते इसलिए वो चुप रहे। सगाई समारोह के अंत तक चुन्नी की बातें होने लगी। गुड़िया के ससुराल वाले भी चुन्नी की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। ये देख कर गुड़िया को और ज्यादा गुस्सा आ गया। एक तो उसकी मर्ज़ी के खिलाफ सगाई हो रही थी क्योकि वो और आगे पढना चाहती थी। ऊपर से चुन्नी कीगुड़िया के ससुराल वाले तारीफ पर तारीफ कर रहे थे। दूसरे दिन शर्मा जी चुन्नी को भला बुरा कहने लगे मुझसे रहा नहीं गया। मेने जब कहा की मेरी बेटी मुंह खुला का खुला रहा गया। गुड़िया ने जब सुना कर कमरे आकर रोने लगी और अपने पापा को कोसने इस बात अनबन हो गयी क्योकि वो पहले से चुन्नी के खिलाफ थे और जब गुड़िया ने विरोध किया तो और भड़क गए। गुड़िया को अंदर भेज कर मुझे जाने को कहा। मैं चुपचाप वहा से निकल आया। चुन्नी कॉलेज भी जाने लगी और वहा भी अच्छे नंबर लाने लगी। एक दिन शर्माजी के घर से निमंत्रण आया। शादी का था। चार दिन बाद शादी हैं। मेने अकेले जाने का फैसला किया। हमारी श्रीमती जी ने शादी से पहले शर्माजी के घर जाकर कोई काम काज़ का पूछने के लिए जाने को बोला दूसरे दिन सुबह मैं जब शर्मा जी के घर पंहुचा तो घर में सन्नाटा था। गुड़िया की माताजी ने बताया की रात को गुड़िया ने ज़हर खा लिया और सभी हस्पताल में हैं। घर में सिर्फ हम औरतें ही हैं। मैं वह से सीधा हस्पताल पंहुचा। शर्माजी और घर मर्द वही खड़े थे। अंदर किसी को जाने की क्योकि सिर्फ औरत ही जा थी। शर्माजी को अभी भी आदमी और औरत का महसूस नहीं हो रहा था। मेने उन्हें सांतना देते हुए घर से किसी औरत को बुलाने को बोला। थोड़ी देर में गुड़िया के ससुराल वाले भी आ गए जिसमे गुड़िया की सास और ननद भी थी। सास को अंदर भेज गया। शर्माजी ने अपने भाई को कहा की केवल तुम जाकर अपनी भाभी को ले आना और ढंग के कपडे पहनने को बोलना। थोड़ी देर बाद जब भाभीजी आई और वो भी अंदर गयी गुड़िया के पास। गुड़िया की तबीयत खराब हो रही थी। कोई सुधार नहीं हो रहा था। थोड़ी देर बाद डॉ ने हार मान ली और डॉ ने शर्माजी से माफी मांग कर कहा की यदि इसे कुछ समय पहले ले आते तो शायद बच जाती मगर अब तो कुछ नहीं बचा हैं। सभी रोने लगे। मैं शर्माजी को दिलासा देते हुए घर ले जाने लगा। शर्माजी रास्ते भर यही कह रहे थे की मेरा कसूर क्या हैं। जबकि मैं और मेरे जैसे लोग ये सोच रहे थे की गुड़िया का क्या कसूर था जो उसकी पढ़ाई छुड़वाकर शादी की और घर गृहस्थी की तरफ धकेल रहे थे। शर्माजी जैसे लोगो को इतना बड़ा हादसा होने के बाद भी समझ नहीं आती हैं। मैं तो यही कहूंगा की क्या कसूर था उसका जो ये कदम उठने को मज़बूर हुयी गुड़ियाँ।
मेरा हर दूसरे तीसरे दिन शर्मा जी के घर आना जाना होता था। शर्माजी के घर में हरदम चहल कदमी रहती हैं। शर्माजी का परिवार और उनके छोटे भाई का परिवार एक ही मकान में रहते हैं। दोनों के परिवार हसंता खेलता रहता हैं। वहां चार छोटे लड़के हैं। शर्माजी के एक लड़का और एक लड़की हैं बाकि तीन लड़के शर्माजी के छोटे भाई के पुत्र हैं। सारे लड़के घर आंगन बाहर बाहर खेलते घूमते फिरते भी हैं मगर लड़की गुड़िया हमेशा उन्हें देखती रहती हैं। अगर वो ज़िद भी करती हैं तो उसे लड़की होना कहकर रोक लिया जाता हैं ,ये मेने काफी बार नोटिस किया मगर मैं बोल कुछ नहीं सकता हूँ। आज सभी घर के लड़के अपने दोस्तों के साथ मूवी देखने जा रहे हैं और वो ज़िद कर रही हैं की वो भी अपनी सहेलियों के साथ मूवी देखने का विचार कर रही हैं इसलिए उसे भी जाने दिया जाये। शर्माजी ने डांट कर उसे घर के अंदर और अपनी मर्यादा में रहने का बोलै साथ में उसकी मम्मी को भी गुड़ियाँ को सम्भाले का जोर दिया। ऐसा कितनी बार हुआ था मगर शर्माजी किसी भी कीमत पर उसे घर की चार दिवारी में ही रखते। इस बात का उसकी माँ को बहुत दुःख था क्योकि इस घर में किसी भी स्त्री को या लड़की बाहर घूमने फिरने की इज़ाज़त नहीं हैं। यहाँ तक की घर के बाहर भी या किसी सड़क पर खड़े होकर किसी से भी बात नहीं कर सकती हैं। गुड़िया पढने लिखने में सभी भाई बहन में होशियार थी मगर उसे कवर घर में रह कर ही अपनी पढ़ाई करनी हैं। मेरी एक बिटिया हैं जिसे मैं अपना लड़का समझता हूँ और उसे हर बात की छूट दे रखी हैं। और वो मेरे विश्वाश के साथ हमेशा अच्छे नंबर से पास हो रही हैं और खेल कूद में भी भाग ले रही हैं। मेने ये बात शर्माजी को नहीं बताई क्योकि फालतू में एक दो उपदेश देंगे और मैं मेरी बिटिया को स्वतंत्र रखना चाहता हूँ। गुड़िया और मेरी चुन्नी दोनों एक ही कक्षा में हैं मगर स्कूल अलग अलग हैं इसलिए उनका कभी मिलाप नहीं हुआ। १२ कक्षा का परिणाम आया। क्योकि यह दोपहर में घोषित हुआ इसलिए मुझे इसका कतिई ध्यान नहीं था। किसी काम से जब शर्मा जी के घर गया तो पता चला की परीक्षा परिणाम आया हैं। मैं मन में अपनी चुनी के लिए सोच ही रहा था की गुड़िया की माताजी गुड़िया के पास होने की खबर ले आई। आज वो प्रतम श्रेणी से उत्तीर्ण हुयी हैं इसलिए उसे अब अच्छे कॉलेज में आसानी से दाखिला मिल जायेगा। ये बात जब गुड़िया की माताजी और गुड़िया ने कही तो शर्माजी को गुस्सा आ गया। उन्होंने कॉलेज नहीं ससुराल जाने की बात कही की अब इसके शादी की बात करो न की कॉलेज की। काफी बहस के बाद भी शर्माजी नहीं माने। हार कर गुड़िया की माताजी ने जो उचित समझो वो कह कर चली गयी। गुड़िया को आगे पढना था मगर शर्माजी को कतई पसंद नहीं। गुड़िया ने कहा की अपने शहर में जो प्रथम आया वो भी लड़की ही हैं। इस पर शर्माजी ने उस लड़की और उसके मत पिता को भला बुरा कहा की आगे जाकर पछतावा होगा उन्हें अपनी लड़की पढ़ाने का। जिज्ञाशावस मैंने गुड़िया नाम पूछ लिया तो उसने बताया की कोई चुन्नीदेवी पुरे राज्य में प्रथम आई हैं। मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं मगर इस वक्त शर्मा जी तेवर देख कर चुप रहना ही उचित समझा। घर जाकर मैंने अपनी चुन्नी को जब देखा तो अपने आपमें गर्व महसूस हुआ। चुन्नी की सहेलियां और हमारे रिस्तेदार सभी घर आकर बढ़ाईं देने लगे। थोड़े दिन बाद शर्मा जी के घर से न्योता आया की गुड़िया की सगाई तय कर दी हैं और हमे सभी को बुलाया हैं। मैं पुरे परिवार के साथ गया। गुड़िया के ससुराल वाले काफी इज्जतदार और पढ़े लिखे लोग हैं उनके घर में बहु बेटिया भी पढ़ी लिखी हैं। जब उन्होंने चुन्नी को वह देखा तो सभी उसके आगे पीछे घूमने लगे। शर्माजी को लड़की इतना खुल कर बात करना पसंद नहीं था मगर अपने घर आये मेहमान का वो अनादर नहीं करना चाहते इसलिए वो चुप रहे। सगाई समारोह के अंत तक चुन्नी की बातें होने लगी। गुड़िया के ससुराल वाले भी चुन्नी की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। ये देख कर गुड़िया को और ज्यादा गुस्सा आ गया। एक तो उसकी मर्ज़ी के खिलाफ सगाई हो रही थी क्योकि वो और आगे पढना चाहती थी। ऊपर से चुन्नी कीगुड़िया के ससुराल वाले तारीफ पर तारीफ कर रहे थे। दूसरे दिन शर्मा जी चुन्नी को भला बुरा कहने लगे मुझसे रहा नहीं गया। मेने जब कहा की मेरी बेटी मुंह खुला का खुला रहा गया। गुड़िया ने जब सुना कर कमरे आकर रोने लगी और अपने पापा को कोसने इस बात अनबन हो गयी क्योकि वो पहले से चुन्नी के खिलाफ थे और जब गुड़िया ने विरोध किया तो और भड़क गए। गुड़िया को अंदर भेज कर मुझे जाने को कहा। मैं चुपचाप वहा से निकल आया। चुन्नी कॉलेज भी जाने लगी और वहा भी अच्छे नंबर लाने लगी। एक दिन शर्माजी के घर से निमंत्रण आया। शादी का था। चार दिन बाद शादी हैं। मेने अकेले जाने का फैसला किया। हमारी श्रीमती जी ने शादी से पहले शर्माजी के घर जाकर कोई काम काज़ का पूछने के लिए जाने को बोला दूसरे दिन सुबह मैं जब शर्मा जी के घर पंहुचा तो घर में सन्नाटा था। गुड़िया की माताजी ने बताया की रात को गुड़िया ने ज़हर खा लिया और सभी हस्पताल में हैं। घर में सिर्फ हम औरतें ही हैं। मैं वह से सीधा हस्पताल पंहुचा। शर्माजी और घर मर्द वही खड़े थे। अंदर किसी को जाने की क्योकि सिर्फ औरत ही जा थी। शर्माजी को अभी भी आदमी और औरत का महसूस नहीं हो रहा था। मेने उन्हें सांतना देते हुए घर से किसी औरत को बुलाने को बोला। थोड़ी देर में गुड़िया के ससुराल वाले भी आ गए जिसमे गुड़िया की सास और ननद भी थी। सास को अंदर भेज गया। शर्माजी ने अपने भाई को कहा की केवल तुम जाकर अपनी भाभी को ले आना और ढंग के कपडे पहनने को बोलना। थोड़ी देर बाद जब भाभीजी आई और वो भी अंदर गयी गुड़िया के पास। गुड़िया की तबीयत खराब हो रही थी। कोई सुधार नहीं हो रहा था। थोड़ी देर बाद डॉ ने हार मान ली और डॉ ने शर्माजी से माफी मांग कर कहा की यदि इसे कुछ समय पहले ले आते तो शायद बच जाती मगर अब तो कुछ नहीं बचा हैं। सभी रोने लगे। मैं शर्माजी को दिलासा देते हुए घर ले जाने लगा। शर्माजी रास्ते भर यही कह रहे थे की मेरा कसूर क्या हैं। जबकि मैं और मेरे जैसे लोग ये सोच रहे थे की गुड़िया का क्या कसूर था जो उसकी पढ़ाई छुड़वाकर शादी की और घर गृहस्थी की तरफ धकेल रहे थे। शर्माजी जैसे लोगो को इतना बड़ा हादसा होने के बाद भी समझ नहीं आती हैं। मैं तो यही कहूंगा की क्या कसूर था उसका जो ये कदम उठने को मज़बूर हुयी गुड़ियाँ।
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