Monday, 9 May 2016

दो पल

दो पल 
बस रवाना होने वाली थी कि एक लड़का दौड़ता हुआ उसमे चढ़ने लगा।  कंडक्टर ने उसे आराम अंदर आने को कहा। वो अंदर आ कर खली सीट देख कर बैठ गया। उसकी सांसे काफी तेज़ चल रही थी। थोड़ा आराम करके कंडक्टर को रायसिंह नगर का टिकट देने को कहा। कंडक्टर ने कहा की ये तो वहां नहीं जाएगी तुम गलत बस में आ गए ,उसने कहा की वहां खड़े पुलिस वाले ने यही कहा मुझे जल्दी हैं क्योकि मेरी माँ की तबियत ख़राब हैं और मुझे उनके पास जल्दी पहुंचना हैं। कंडक्टर बोला की ये तो गलत हो गया तुम वापस उतर जाओ और वहां की बस ध्यान देकर चढ़ना। कही फिर गलत बस में न बैठ जाओ। हड़बड़ाहट के साथ वो चलती बस में से उतरने लगा। कंडक्टर ने रोका और कहा कि  बस रुकने दे मगर वो नहीं माना।  बोला    मुझे हरहाल में जल्दी से जल्दी जाना हैं। वो चलती बस से कूद गया मगर पीछे आ रही कार ने टक्कर मार दी जिससे वो उछल कर सड़क के दूसरी तरफ गिर पड़ा। हमारी बस रुकी और हम सभी दौड़ते हुए उसके पास पहुंचे मगर तब तक वो मर चूका था , पुलिस ने आकर एम्बुलेंस को बुलवाया और उसकी जेब से बटुआ निकाल कर उसकी पहचान ढूंढने की कोशिश करने लगी क्योकि हम सभी उसको नहीं पहचानते थे।जेब में खली १०० के अलावा कुछ नहीं मिला  केवल कंडक्टर की दो पल की बात हुयी। कंडक्टर अपने आप को कोस  था। उस लड़के की  माँ बीमार थी और या तो रायसिंह नगर या उसके आस पास किसी गॉव का रहने वाला था।यही उसकी पहचान थी जो हम सभी ने पुलिस को बता दी।  हम वापस बस में आ गए मगर सभी उस लड़के के दो पल को ही याद कर रहे थे। कभी कभी हम किसी के साथ कितना भी पल गुजार ले तो भी वो हमे याद नहीं रहते हैं और आज इस बात को सालों बीतने के बाद भी उस लड़के की छवि दिमाग से निकलती नहीं हैं। मेने बाद में पता करवाया की उसकी माँ या घर का कोई सदस्य मिला तो पुलिस वालों ने कहा नहीं और कुछ दिन बाद लावारिस समझ कर उसका अंतिम संस्कार कर दिया। मुझे काफी दिनों तक रोना आया। उस लड़के की माँ में क्या बीती होगी क्या वो आज भी अपने आँखों के तारे का इंतज़ार कर रही हैं या घर में कोई और सदस्य नहीं होने के कारण माँ भी। अगर में उसके घर को ढूंढने भी जाता तो कहा।  रह रह कर मुझे वो घटना खाये जा रही हैं।  किसी ने भी उससे दो पल के लिए बात नहीं की।  

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