छोटी छोटी कहानियां
उसका दिल बहुत बड़ा हैं। वो हमेशा किसी न किसी की सहायता के लिए आगे रहती हैं। जाने क्यों उसके दिल में कोई किसी के लिए नफरत नहीं हैं। जब छोटी थी तब की बात हैं उसके घर की माली हालात सही नहीं थी. एक दिन अपने किसी सहेली के घर गयी। सहेली की माँ ने उसे कुछ खाने को दिया मगर जिस तरीके से दिया उससे उसका मन लज्जित सा हो गया ऐसा लगा जैसे उसे भिखारी समझ कर खाने को दिया हैं । इसी तरह एक दो और रिस्तेदारों के जब वो घर गयी या उनके यहाँ आते तो और किसी भी तरह की अगर सहायता करते उसे पसंद नहीं था। क्योकि सहायता जो करता वो या तो जताता या अहसान करवाता की हमारे कारण आप लोगो का खाना पीना चल रहा हैं। उसके माता पिता भी इस अहसान के तले दबे जा रहे थे मगर उन्हें पता था की एक ही लड़की हैं और अगर हमने इसके अंदर किसी भी हीनभावना का विचार डाल दिया तो ये बहुत परेशान होगी। जैसे तैसे वो बड़ी हुयी तो उसकी शादी भी एक साधारण परिवार में हुयी। उसने कोई भी विरोध नही किया क्योकि कोई दहेज़ नहीं लाना था साथ। लायी अपने साथ तो केवल दरियादिली। जो उसके रिस्तेदारों ने और कुछ सहेलियों के कारण मिली।उसने सोच लिया की अगर किसी की सहायता करुँगी तो अहसान जताते नहीं बल्कि एक फ़र्ज़ की तरह। उसने ठान लिया की में अब किसी के आगे हाथ नहीं फेलाऊँगी और जब तक हो सकेगा किसी को फैलाने भी नहीं दूंगी। धीरे धीरे उसके पति ने तरक्की की जिस कारण वो दोनों अलग शहर में मकान लेकर रहने लगे। आज उसके घर में दो कामवाली बाई आती हैं मगर वो कभी उन्हें कामवाली ना मानकर घर का सदस्य या मेहमान की तरह उनका खाना चाय नास्ता सभी कुछ अपने हाथों से करती. चाहे उसके लिए पति से झगड़ना ही क्यों न पड़े. इस बात से उसके खफा होते मगर वो किसी तरह मना लेती। आज भी उसके रिस्तेदार उससे मिलने उसके घर आते और पुरानी बातों को कहते हैं तो उसके पति को बहुत बुरा लगता हैं। वो कहते हैं की उससे ज्यादा हम लोगो ने वापस कर दिया फिर भी सभी अपने किये हुए अहसानों की गाथा को ख़त्म नहीं करते हैं चाहे वो मेरे रिस्तेदार हो या मेरे ससुराल के। वो यही कहती की क्या आपने सिर्फ इसलिए उनकी सहायता या काम करते हो कि वो हमारे कभी काम आये या उनका अहसान हमारे ऊपर हैं तो फिर उनमे और हममे क्या अंतर होगा। और ये सिलसिला चलता रहेगा कभी वो और कभी हम बस सोचते रहेंगे कि हमने उन पर अहसान किया। नहीं ऐसा मत सोचो। मैं आप जीतनी पढ़ी लिखी और समझदार नहीं हूँ मगर इस अहसान शब्द रुपी बाण के चोट का दर्द बरसों तक सहन करना पड़ता हैं ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जनता हैं। उसका पति बस इन्ही बातों के कारण चुप रहता था। उसके मोहल्ले की औरतें हमेशा उसके घर अपना रोना लेकर आती और वो कुछ भी करके उनकी सहायता के लिए तैयार रहती। कामवाली बाई से लेकर बाहर कचरे वाली हो या आसपास के घरों के लोग ,सभी जानते थे की ये हमारी सहायता हर हाल में करेगी चाहे वो पैसों की हो या सामान की ,वापस न मांगना और ना ही उसका भविष्य में जिक्र करना ये उसकी महानता हैं। इसी कारण से ससुराल हो या रिस्तेदार हो या फिर मोहल्ले की औरतें। ख़ुशी हो या गम उसको जरूर बुलाते थे क्योकि उन्हें पता हैं की इसके आने से हमारी आधी जिम्मेदारी ख़त्म हो जाएगी। अगर इसके पास पैसे ना भी हो तो कही से उधार लाकर उनकी सहायता करेगी। बीमारी में उनके साथ रहना और तन मन धन से सेवा करना ये उसका नित्य कर्म बन गया। उसके पति और बेटे बेटी की तरफ ध्यान कम रहता था क्योकि दूर दूर के रिस्तेदारों और ससुराल वालों से घनिष्ठता बहुत बढ़ा रखी थी। लम्बा चौड़ा परिवार बनाने के कारण वो हर दम उन्ही के कामों में व्यस्त रहती थी। दूसरों के घर बनाने और उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय देने के कारण कब अपने पति और बेटे बेटी से दूर हो गयी पता ही ना चला। वो तीनों अब उसके घरमे होने या ना होने में फर्क नहीं मानते थे। उसकी सारे रिस्तेदारों और जानकारों सिर्फ इतनी जरुरत थी की वो उनके काम आये। क्योकि जब भी उसे किसी की जरुरत हुयी सभी के हाथ खड़े कर दिए। इसके बावजूद वो उनसभी को गलत नहीं मानती थी। उसके दिमाग में जो बचपन में आया वही आज भी हैं। अहसान नहीं जताना हैं और अहसान नहीं लेना हैं। बेटी शादी में उसने सोचा की अगर पति महाशय पूरा इंतजाम नहीं कर पाए तो क्या हुआ रिस्तेदार से उधार लेकर ब्याह करवा दूंगी।मगर किसी का अहसान नहीं लुंगी। पति के साथ बच्चों ने भी समझाया मगर वो नहीं मानी। सभी जानकारों रिस्तेदारों को शादी के छोटे मोटे उत्सवों में बुलवाया और अधिक से अधिक खर्चा किया। हालात ये हो गए की रिस्तेदार आपस में झगड़ने लगे क्योकि वो कभी साथ रहे नहीं और इसने कभी किसी को पराया माना नहीं। उसके पति और बेटी ने सभी को सम्भाल रखा था। हद तो तब हुयी जब बरात आई। स्वागत के समय वो रिस्तेदारों और मेहमानों को खिलाने में व्यस्त थी। उसकी बहन ने बरातियों का स्वागत किया। लड़के वाले बहुत नाराज़ मगर उसके पति और बेटे ने स्थिति को सम्भाल लिया। बेटे ने अपनी माँ को हिदायत दी की फेरे के समय आप हम सब के साथ रहेंगी। थोड़ी देर बाद जब सभी मेहमान बाराती खाना खा चुके तब फेरे के लिए मंडप के पास एकत्रित हुए. उसके पति और बेटे ने उसको ढूंढने के लिए वहां खड़े रिस्तेदारों को बोला। सभी इधर उधर खोजने लगे। पुरे पांडाल में हा हा कार मच गया। वो कही नहीं मिली। यहाँ तक लड़की के सास ससुर भी उसे ढूंढने लगे , मगर वो कही नहीं मिली। फेरों का समय निकला जा रहा था. उसके पति का गुस्सा आज सातवें आसमान था। उसकी बेटी रो रो कर अपना सारा श्रृंगार खराब कर चुकी थी। काफी मेहमान जा चुके थे। हलवाई भी अपना सारा सामान समेट चूका था. काफी देर बाद भी उसका ना मिलने के कारण उसके पति ने फेरे की रस्म पूरी करने को कहने लगे। लड़की के ससुर और दामाद दोनों समझदार थे। इसलिए उन्होंने कहा की फेरे माताजी के आने के बाद पूरी होगी तबतक सभी उन्हें ढूंढते हैं। जिन रिस्तेदारों की वो सहायता करती वो सभी अपने अपने घर जा चुके थे ,बहुत काम लोग वह मौजूद थे। जिसमे से कुछ उसे ढूंढने निकल पड़े. काफी देर बाद वो पांडाल में आती दिखाई दी। सभी एकसाथ शोर करने लगे। उसका बेटा और पति काफी गुस्से में उससे बात कर रहे थे की उसकी खुद की बेटी की शादी में वो यहाँ वहां डोल रही हैं। मगर लड़कों के घरवालों ने मामला थोड़ी देर के लिए शांत करते हुए फेरे लेने की तैयारी करने को कहा। जल्दी से फेरे पूर्ण हुए। अब सभी हसते हुए गिने चुने लोग विदाई का इंतज़ार कर रहे थे। तभी लड़की की सास ने उसको इतनी देर गायब रहने का कारण पूछा तो वो बोली कुछ नहीं दामाद जी की नानी का सन्देश आया की वो और नाना नहीं आ सकते हैं और नानाजी की तबीयत भी ठीक नहीं हैं तो मेने सोचा की उनके लिए खाना भिजवा दू और मगर सभी खाने पीने में व्यस्त थे इसलिए मैं अकेली चली गयी और अच्छा हुआ क्योकि नाना नानीजी को अपने हाथों से खाना परोस कर खिलाया क्योकि उनकी खड़े होने की भी स्थिति नहीं थी। । सभी उसकी दयालुता के कारण खुश हो गए। बेटी और दामाद जब लड़के के माता पिता के पैर छूने लगे तो लड़के के पिता ने कहा की सबसे पहले इस देवी के पॉव छू। और आज हम सभी को गर्व हैं की इस देवी की बेटी हमारे घर की बहु बनेगी। सभी के आँखों में आशु थे चाहे वो लड़के की तरफ से हो या लड़की के वालों के। वो विदाई के आँशु नहीं बल्कि उस साक्षात् देवी कि दरयादिली के कारण सभी उसको नतमस्तक हो रहे थे मगर वो इस काम को अपना फ़र्ज़ ही समाज रही थी। उसका पति अपनी पत्नी के सामने अपने आपको बहुत ही छोटा समझ रहा था। उसका बेटा अपने आप पर गर्व कर रहा था की माँ हो तो बस ऐसी साक्षात् देवी माँ। बहन की विदाई कैसे हुयी उनलोगो को पता नहीं मगर बेटा आज माँ के गले मिलकर फूटफूट रोने लगा और कह रहा था कि आपको हम हमेशा गलत समझते थे , गलत क्या हम तो समझ ही नहीं सके आपको की आप कौन हैं। बस मेरी माँ हो और माँ देवी से भी बढ़ कर होती हैं। ये मेने आज जाना हैं।
उसका दिल बहुत बड़ा हैं। वो हमेशा किसी न किसी की सहायता के लिए आगे रहती हैं। जाने क्यों उसके दिल में कोई किसी के लिए नफरत नहीं हैं। जब छोटी थी तब की बात हैं उसके घर की माली हालात सही नहीं थी. एक दिन अपने किसी सहेली के घर गयी। सहेली की माँ ने उसे कुछ खाने को दिया मगर जिस तरीके से दिया उससे उसका मन लज्जित सा हो गया ऐसा लगा जैसे उसे भिखारी समझ कर खाने को दिया हैं । इसी तरह एक दो और रिस्तेदारों के जब वो घर गयी या उनके यहाँ आते तो और किसी भी तरह की अगर सहायता करते उसे पसंद नहीं था। क्योकि सहायता जो करता वो या तो जताता या अहसान करवाता की हमारे कारण आप लोगो का खाना पीना चल रहा हैं। उसके माता पिता भी इस अहसान के तले दबे जा रहे थे मगर उन्हें पता था की एक ही लड़की हैं और अगर हमने इसके अंदर किसी भी हीनभावना का विचार डाल दिया तो ये बहुत परेशान होगी। जैसे तैसे वो बड़ी हुयी तो उसकी शादी भी एक साधारण परिवार में हुयी। उसने कोई भी विरोध नही किया क्योकि कोई दहेज़ नहीं लाना था साथ। लायी अपने साथ तो केवल दरियादिली। जो उसके रिस्तेदारों ने और कुछ सहेलियों के कारण मिली।उसने सोच लिया की अगर किसी की सहायता करुँगी तो अहसान जताते नहीं बल्कि एक फ़र्ज़ की तरह। उसने ठान लिया की में अब किसी के आगे हाथ नहीं फेलाऊँगी और जब तक हो सकेगा किसी को फैलाने भी नहीं दूंगी। धीरे धीरे उसके पति ने तरक्की की जिस कारण वो दोनों अलग शहर में मकान लेकर रहने लगे। आज उसके घर में दो कामवाली बाई आती हैं मगर वो कभी उन्हें कामवाली ना मानकर घर का सदस्य या मेहमान की तरह उनका खाना चाय नास्ता सभी कुछ अपने हाथों से करती. चाहे उसके लिए पति से झगड़ना ही क्यों न पड़े. इस बात से उसके खफा होते मगर वो किसी तरह मना लेती। आज भी उसके रिस्तेदार उससे मिलने उसके घर आते और पुरानी बातों को कहते हैं तो उसके पति को बहुत बुरा लगता हैं। वो कहते हैं की उससे ज्यादा हम लोगो ने वापस कर दिया फिर भी सभी अपने किये हुए अहसानों की गाथा को ख़त्म नहीं करते हैं चाहे वो मेरे रिस्तेदार हो या मेरे ससुराल के। वो यही कहती की क्या आपने सिर्फ इसलिए उनकी सहायता या काम करते हो कि वो हमारे कभी काम आये या उनका अहसान हमारे ऊपर हैं तो फिर उनमे और हममे क्या अंतर होगा। और ये सिलसिला चलता रहेगा कभी वो और कभी हम बस सोचते रहेंगे कि हमने उन पर अहसान किया। नहीं ऐसा मत सोचो। मैं आप जीतनी पढ़ी लिखी और समझदार नहीं हूँ मगर इस अहसान शब्द रुपी बाण के चोट का दर्द बरसों तक सहन करना पड़ता हैं ये मुझसे बेहतर कोई नहीं जनता हैं। उसका पति बस इन्ही बातों के कारण चुप रहता था। उसके मोहल्ले की औरतें हमेशा उसके घर अपना रोना लेकर आती और वो कुछ भी करके उनकी सहायता के लिए तैयार रहती। कामवाली बाई से लेकर बाहर कचरे वाली हो या आसपास के घरों के लोग ,सभी जानते थे की ये हमारी सहायता हर हाल में करेगी चाहे वो पैसों की हो या सामान की ,वापस न मांगना और ना ही उसका भविष्य में जिक्र करना ये उसकी महानता हैं। इसी कारण से ससुराल हो या रिस्तेदार हो या फिर मोहल्ले की औरतें। ख़ुशी हो या गम उसको जरूर बुलाते थे क्योकि उन्हें पता हैं की इसके आने से हमारी आधी जिम्मेदारी ख़त्म हो जाएगी। अगर इसके पास पैसे ना भी हो तो कही से उधार लाकर उनकी सहायता करेगी। बीमारी में उनके साथ रहना और तन मन धन से सेवा करना ये उसका नित्य कर्म बन गया। उसके पति और बेटे बेटी की तरफ ध्यान कम रहता था क्योकि दूर दूर के रिस्तेदारों और ससुराल वालों से घनिष्ठता बहुत बढ़ा रखी थी। लम्बा चौड़ा परिवार बनाने के कारण वो हर दम उन्ही के कामों में व्यस्त रहती थी। दूसरों के घर बनाने और उन्हें ज्यादा से ज्यादा समय देने के कारण कब अपने पति और बेटे बेटी से दूर हो गयी पता ही ना चला। वो तीनों अब उसके घरमे होने या ना होने में फर्क नहीं मानते थे। उसकी सारे रिस्तेदारों और जानकारों सिर्फ इतनी जरुरत थी की वो उनके काम आये। क्योकि जब भी उसे किसी की जरुरत हुयी सभी के हाथ खड़े कर दिए। इसके बावजूद वो उनसभी को गलत नहीं मानती थी। उसके दिमाग में जो बचपन में आया वही आज भी हैं। अहसान नहीं जताना हैं और अहसान नहीं लेना हैं। बेटी शादी में उसने सोचा की अगर पति महाशय पूरा इंतजाम नहीं कर पाए तो क्या हुआ रिस्तेदार से उधार लेकर ब्याह करवा दूंगी।मगर किसी का अहसान नहीं लुंगी। पति के साथ बच्चों ने भी समझाया मगर वो नहीं मानी। सभी जानकारों रिस्तेदारों को शादी के छोटे मोटे उत्सवों में बुलवाया और अधिक से अधिक खर्चा किया। हालात ये हो गए की रिस्तेदार आपस में झगड़ने लगे क्योकि वो कभी साथ रहे नहीं और इसने कभी किसी को पराया माना नहीं। उसके पति और बेटी ने सभी को सम्भाल रखा था। हद तो तब हुयी जब बरात आई। स्वागत के समय वो रिस्तेदारों और मेहमानों को खिलाने में व्यस्त थी। उसकी बहन ने बरातियों का स्वागत किया। लड़के वाले बहुत नाराज़ मगर उसके पति और बेटे ने स्थिति को सम्भाल लिया। बेटे ने अपनी माँ को हिदायत दी की फेरे के समय आप हम सब के साथ रहेंगी। थोड़ी देर बाद जब सभी मेहमान बाराती खाना खा चुके तब फेरे के लिए मंडप के पास एकत्रित हुए. उसके पति और बेटे ने उसको ढूंढने के लिए वहां खड़े रिस्तेदारों को बोला। सभी इधर उधर खोजने लगे। पुरे पांडाल में हा हा कार मच गया। वो कही नहीं मिली। यहाँ तक लड़की के सास ससुर भी उसे ढूंढने लगे , मगर वो कही नहीं मिली। फेरों का समय निकला जा रहा था. उसके पति का गुस्सा आज सातवें आसमान था। उसकी बेटी रो रो कर अपना सारा श्रृंगार खराब कर चुकी थी। काफी मेहमान जा चुके थे। हलवाई भी अपना सारा सामान समेट चूका था. काफी देर बाद भी उसका ना मिलने के कारण उसके पति ने फेरे की रस्म पूरी करने को कहने लगे। लड़की के ससुर और दामाद दोनों समझदार थे। इसलिए उन्होंने कहा की फेरे माताजी के आने के बाद पूरी होगी तबतक सभी उन्हें ढूंढते हैं। जिन रिस्तेदारों की वो सहायता करती वो सभी अपने अपने घर जा चुके थे ,बहुत काम लोग वह मौजूद थे। जिसमे से कुछ उसे ढूंढने निकल पड़े. काफी देर बाद वो पांडाल में आती दिखाई दी। सभी एकसाथ शोर करने लगे। उसका बेटा और पति काफी गुस्से में उससे बात कर रहे थे की उसकी खुद की बेटी की शादी में वो यहाँ वहां डोल रही हैं। मगर लड़कों के घरवालों ने मामला थोड़ी देर के लिए शांत करते हुए फेरे लेने की तैयारी करने को कहा। जल्दी से फेरे पूर्ण हुए। अब सभी हसते हुए गिने चुने लोग विदाई का इंतज़ार कर रहे थे। तभी लड़की की सास ने उसको इतनी देर गायब रहने का कारण पूछा तो वो बोली कुछ नहीं दामाद जी की नानी का सन्देश आया की वो और नाना नहीं आ सकते हैं और नानाजी की तबीयत भी ठीक नहीं हैं तो मेने सोचा की उनके लिए खाना भिजवा दू और मगर सभी खाने पीने में व्यस्त थे इसलिए मैं अकेली चली गयी और अच्छा हुआ क्योकि नाना नानीजी को अपने हाथों से खाना परोस कर खिलाया क्योकि उनकी खड़े होने की भी स्थिति नहीं थी। । सभी उसकी दयालुता के कारण खुश हो गए। बेटी और दामाद जब लड़के के माता पिता के पैर छूने लगे तो लड़के के पिता ने कहा की सबसे पहले इस देवी के पॉव छू। और आज हम सभी को गर्व हैं की इस देवी की बेटी हमारे घर की बहु बनेगी। सभी के आँखों में आशु थे चाहे वो लड़के की तरफ से हो या लड़की के वालों के। वो विदाई के आँशु नहीं बल्कि उस साक्षात् देवी कि दरयादिली के कारण सभी उसको नतमस्तक हो रहे थे मगर वो इस काम को अपना फ़र्ज़ ही समाज रही थी। उसका पति अपनी पत्नी के सामने अपने आपको बहुत ही छोटा समझ रहा था। उसका बेटा अपने आप पर गर्व कर रहा था की माँ हो तो बस ऐसी साक्षात् देवी माँ। बहन की विदाई कैसे हुयी उनलोगो को पता नहीं मगर बेटा आज माँ के गले मिलकर फूटफूट रोने लगा और कह रहा था कि आपको हम हमेशा गलत समझते थे , गलत क्या हम तो समझ ही नहीं सके आपको की आप कौन हैं। बस मेरी माँ हो और माँ देवी से भी बढ़ कर होती हैं। ये मेने आज जाना हैं।
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