छोटी छोटी कहानियां -३ ---- नादान देशभक्त
ये बात कान्हु को अच्छी नहीं लगी। पहले जितना डरा हुआ था उससे ज्यादा गुस्सा आ रहा था क्योकि उसको अपने चाचाजी से बहुत लगाव था। उसने दोनों बहनो को इशारा किया की इस सैनिक को पकड़कर पेड बांध देते हैं और गॉव वालों को बचाते। हैं। लड़कियों ने कहा की पहले सैनिक को तो पकड़ो फिर आगे बात करते हैं । तीनो ने मिलकर उस सैनिक को पेड़ से बांध दिया। मगर लड़कियां वापस जाने नहीं बल्कि सारे हथियार गंतव्य स्थान तक पहुंचने के लिए अड़ गयी। मगर कान्हु सिर्फ उन गॉव वालो और अपने चाचाजी को बचाने के लिए जिद करने लगा। उसने लड़कियों को समझांने लगा। उसकी सोच ये थी की यदि इन अंग्रेजी सेना मार दे या भगा दे तो शायद ये हथियार भी काम आएंगे और बाद में इन्हे गंतव्य स्थान भी पहुंचा देंगे।ये भी तो देश भक्ति हैं। दोनों लड़कियों ये बात समझ में आ गयी। उन्होंने बैलगाड़ी को जब वापस मोड़ा तो सैनिक कुछ बोलने लगा। लड़कियों ने रुक कर उसको सुनने लगी. मुंह से कपडा हटाते ही वो सैनिक बोला की तुम तीनो २०-२५ सैनिकों को नहीं रोक सकोगी। उनके पास बन्दुके हैं। आप लोग जहां जाना चाहते हो वही जाओ। ये बच्चा नादान हैं। कान्हु ने कहा ... भले ही मैं छोटा हूँ मगर अपने चाचाजी से इन अंग्रेजो लड़ना सीखा हैं। वैसे आप जैसे देश द्रोही को तो यही मार देना चाहिए। सैनिक बोला। . मैं देश द्रोही नहीं हूँ। हम सभी को जोर जबरदस्ती से सैनिक बनाया हैं। मैं अपने बच्चे की कसम खाता हूँ ,मैं देशद्रोही नहीं हूँ। आप लोग कहे तो मैं भी अब तुम लोगो का साथ देने को तैयार हु क्योकि इस छोटे से बच्चे का जोश और तुम दोनों लड़कियों का हौशला देख मेरे अंदर देशप्रेम जाग उठा हैं। उस सैनिक का साथ मिलते ही तीनो में जोश आ गया। हथगोले और बन्दुक निकाल कर छोटे रास्ते से अंग्रेजी सेना से पहले गॉव के नज़दीक पहुंच गयी। वो छोटा रास्ता उस सैनिक ने ही बताया था। जैसे ही अंग्रेजी सेना दिखी कान्हु से ताबड़तोड़ बन्दुक चलायी और हथगोले को सीधे अंग्रेज के ऊपर फेंका जिससे अंग्रेज के साथ कुछ सैनिक मारे गए। कुछ सैनिक भागने लगे तो कान्हु का साथ देने वाले सैनिक ने आगे आकर घेर लिया। सभी ने हथियार डाल दिए। कान्हु ने सबको माफ़ करने की एक शर्त रखी की सभी अब स्वतंत्रता सेना में काम करेंगे और देश को आज़ाद करवाने की कशम लेंगे। सभी ने कसम ली की जब अंग्रेजो की सेना में रह कर मरना हैं तो क्यों ना देश के लिए मरे। कान्हु ने सबको उन लड़कियों का साथ देने को कहा और कहा की तुम सभी अब इन लड़कियों को गंतव्य स्थान पहुँचाओगे। जोर के धमाके कारण रूपमल भी दौड़ कर उस स्थान पर पहुंचे जब उन्होंने अंग्रेज को मरा हुआ देखा और कान्हु को सिपाहियों के बिच गिरा हुआ देख गबरा गए। जय भारतमाता की बोलते हुए तेजी से उन सब की और दौड़ने लगे। मगर कान्हु और उन सैनिकों ने जब भरत्नाता की जय जयकार लगायी तो रूपमल का गुस्सा शांत हुआ और वो रुक गए। क्योकि उन्होंने कान्हु की जान खतरे में देख कर ये कदम उठाया मगर यहाँ तो सभी भारतमाता की जय बोल रहे हैं। जब वो कान्हु के पास आये तब उन लड़कियों ने पूरा वृतान्त सुनाया। रूपमल ने अपने भतीजे कान्हु को गले लगाकर बोले आज मेरी तपस्या सफल हुयी हैं। अब तू ही अकेले इन सभी हथियारों को लेकर लड़कियों के साथ जाएगा। अब तो नहीं डरेगा। या किसी को साथ भेजु। सभी खिल खिला कर हंसने लगे। सबसे विदा लेकर वो तीनो निकल पड़े। अब रूपमल को डर नहीं हैंकिसी भी प्रकार का। सफर जरूर १०० किलोमीटर से ज्यादा का हैं मगर कान्हु पर पूरा भरोसा था। दिन आधा हो चूका था इसलिए कान्हु बैलगाड़ी को तेज़ी से हांकने लगा। शाम होते होते वो एक मंदिर के पास पहुंचे। रात को वही रुकने का फैशला लिया दोनों लड़कियां मंदिर के अंदर सो गयी और कान्हु दरवाजे के पास सो गया। सुबह देर से आँख खुली तब तक दोनों लड़कियों नहाधो कर तैयार हो चुकी थी। कान्हु को उन्होंने जगाया नहीं क्योकि वो उसको थका हुआ समझ कर सोने दे रही थी। अब कान्हु भी तैयार होकर वापस बैलगाड़ी को तैयार करने लगा। दोनों बहनों को आकर बैठने को बोलकर जल्दी जल्दी चलने को कहा। एक बोली ... क्यों कान्हु जल्दी जल्दी क्यों .. डर लग रहा हैं या भूख।
कान्हु .. दीदी डर अब इतना तो नहीं लगता मगर थोड़ी देर में भूख जरूर लग जाएगी क्योकि सुबह सुबह खाने का मज़ा कुछ और हैं। तीनो थोड़ी दूर जाने के बाद एक दूकान से दही और गुड के साथ प्याज़ ले आये। रोटियां उनके पास पहले से थी। तीनो ने भरपेट भोजन करने के बाद तेज़ी से शहर बैलगाड़ी को दौड़ने लगे। जहां हथियार पहुंचाने थे वहां से थोड़ी दूर पहले अंग्रेजो ने गस्त लगा रखी थी उनके पास पहुंचना बहुत ही मुश्किल का काम था। एक दीदी को कान्हु ने खाली हाथ जाने को कहा और बोला की वहां जो भी आपके गुरूजी हैं उन्हें केवल इशारा कर देना की माल आ गया हैं , फिर मैं दूसरी दीदी को भेजूंगा जो की पूरा रास्ता साफ़ होने का मुझे संकेत करेगी और मैं इस बैलगाड़ी को वहां तक भगा कर ले आऊंगा। तब तक गुरूजी भी कोई न कोई इंतज़ाम कर ही देंगे। जब पहली दीदी उस पाठशाला के पास पहुंची तो देखा की वहां कोई नहीं था। इधर उधर भी ध्यान दिया मगर कही कोई नज़र नहीं आये। आते भी कैसे ये लोग एक दिन देरी से चल रहे थे और सेनानियों ने अपना ठिकाना बदल दिया । एक दिन तो वही अंग्रेजो से भिड़ंत में निकल गया। इतने में एक बूढ़ी औरत ने उस लड़की से टक्करा गयी। लड़की ने जब उस बूढ़ी औरत को उठाया तो उसने एक कागज़ का टुकड़ा हाथ में थमा दिया। उस लड़की ने वही खोल कर पढ़ने लगी ये सब अंग्रेज देख रहे थे इसलिए वो बोले कुछ नहीं बस उस लड़की की हरकत पर नज़र रखे हुए थे। ये सारा नज़ारा कान्हु ने भी देख लिया की कुछ लोग दीदी पर नगर रखे हुए हैं इसलिए उसने वहां से निकल कर छुपने लगा। वो लड़की को जब नया ठिकाने का पता मिला। उसने वो कागज़ मुंह में खा लिया। तीनो अब अलग अलग दिशाओं में एक दूसरे को बचाने के लिए गुम रहे थे। क्योकि किसी भी तरह बैलगाड़ी में रखे हथियारों को अंग्रेजो के हाथ नहीं लगने देना हैं। दोनों लड़कियां धीरे धीरे नए पते की तरफ जाने लगी और कान्हु को इशारा किया की थोड़ा रुक रुक कर हमारे पीछे बैलगाड़ी को लेकर आना। अंग्रेजी सेना का ध्यान कान्हु की तरफ नहीं था। वो आराम से बैलगाड़ी को धीरे धीरे चलने लगा। जब भी लड़कियां किसी कारण से रूकती तो कान्हु भी बैलगाड़ी से उतर कर बार बार बैलो को सहलाने जैसा करता जिससे ये लगता की बैल आगे चलने को तैयार नहीं हैं। काफी लोग इधर उधर घूम रहे थे। इतना बड़ा शहर देख कान्हु वैसे ही मस्त हो रहा था। बड़ी बड़ी हवेलियां को देख वो दंग रह गया। जब वो एक बड़ी हवेली के पास पंहुचा तो दोनों लड़कियां कही आस पास दिखाई नहीं दी। वो इधर उधर ढूंढने लगा। ये देख कर एक सिपाही उसको इसका कारण पूछने लगा। वो फिर वही रोने जैसा मुंह बना कर कहने लगा की मैं अपने पिताजी के साथ आया मगर वो काफी देर से वापस नहीं आये हैं इसलिए बार बार यहाँ वहा देख रहा हूँ। आपने मेरे पिताजी को कही देखा हैं। सिपाही ने कहा .. मैं तेरे पिताजी को नहीं जनता तो देखूंगा कैसे , कौन हैं तेरे पिताजी । कोई बड़े व्यापारी हैं।
कान्हु बोला अभी थोड़ी देर पहले बैलगाड़ी के आगे आगे चल रहे थे की अचानक कही खो गए मुझे भूख भी लगी हैं । सिपाही ने उसे वही रुकने को कहा और बोले तुम यही रुको में तुम्हारे खाने का इंतज़ाम करता हूँ। सिपाही जब खाना लेने गया तब वापस दोनों दीदी दिखाई दी। उन्होंने उसे बैलगाड़ी को पास के मकान के अंदर ले जाने को बोला। कान्हु जल्दी से उस बैलगाड़ी को पास के मकान में ले गया और वपास वही आकर खड़ा हो गया। सिपाही जब खाना लेकर आया तो उसने बैलगाड़ी नहीं देखि। कान्हु खाना लेकर ऐसे खाने लगा जैसे कभी कुछ खाया नहीं हो और बरसों से कुछ नहीं खाया हैं। उसे भूख नहीं थी मगर जबरदस्ती वो खा रहा था। सिपाही उसे बैलगाड़ी के बारे में पूछने लगा तो कान्हु के मुंह में इतना सारा खाना होने के कारण बोला नहीं जा रहा था। उसने रुकने का इशारा किया। मगर सिपाही उसकी बैलगाड़ी को ढूंढने के लिए नज़रे यहाँ वहा दौड़ा रहा था। उसकी बैलगाड़ी कही नज़र नहीं आई। दोनों लड़कियां बैलगाड़ी को जल्दी से अंदर ले जाकर खाली कर रही थी बाहर जब कान्हु को सिपाही के साथ देखा तो गुरूजी ने उन लड़कियों को बैलगाड़ी खाली करके वहा से भागने को बोला। दोनों चुप चाप वहा से खिसक गयी। कान्हु को सिपाही छोड़ने को तैयार नहीं। सिपाही को लगा की कुछ न कुछ गड़बड़ हैं। उसने सिटी बजाकर दूसरे सिपाहीयों को भी बुला आकर सारा माज़रा समझा दिया। सभी उस बैलगाड़ी को यहाँ वहाँ ढूंढने निकल पड़े। गुरूजी के आदमियों ने बैलगाड़ी को बैलो से अलग करके तोड़ने का आदेश दे दिया। कान्हु को खूब डराया धमकाया की तेरी बैलगाड़ी कहा हे जिसमे सामान भरा हुआ था। कान्हु ने कहा की वो कोई बैलगाड़ी नहीं लेकर आया। दोनों लड़कियां अपने अपने घर में जाकर छुप गयी। कान्हु को सिपाही थाने में ले आये। बड़े साहब ने जब कान्हु को पूछा की कोनसे गॉव से हो और यहाँ क्या करने आये किसके घर आये को। कान्हु यहाँ किसी को नहीं जानता था। क्या बताता। रोने लगा। सिपाही ने कहा की साहब इसकी नादानियों पर मत जाओ। ऐसे लड़के बहुत चालाक होते हैं। आप इसको मार पीटकर बुलवाए। ये इन भारतियों की मदद कर रहा हैं। क्योकि हमे जो जानकारी मिली थी की किसी बैलगाड़ी में हथियार आ रहे हैं मुझे लगता हैं वो यही लेकर आया हैं। आप उसका ठिकाना पूछो साहब जी वर्ना ये लोग हमारी हुकूमत पर हमला बोल देंगे। इतने में एक अंग्रेज सिपाही जो की शहर की सीमा पर चौकसी के दौरान कान्हु को देखा था आ गया। उसने कान्हु को पहचान लिया। उसने कान्हु को बहलाने की कोशिश की की यदि तुम्हे नहीं पता की बैलगाड़ी में क्या था तो तुम केवल ये बता दो की वो बैलगाड़ी कहाँ पर गयी। हम तुम्हे मालामाल कर छोड़ देंगे। काफी देर तक डरा धमका कर जब कान्हु ने नहीं बताया तो अंग्रेज ने उसे गरम लोहे की छड़ से पीठ जलाने की बात कही। मगर कान्हु बिलकुल भी नहीं घबराया। वो सिर्फ यही बोला की जिसको जहां पहुंचना था वो वहा पहुंच गया। आप लोग चाहे मुझे मार डाले मगर मैं नहीं बताऊंगा। पूरी रात कान्हु को मारते रहे , गरम लोहे ही छड़ से जहां जलाया वहां मिर्च भी लगाई मगर कान्हु ने ना तो अपने गॉव का पता बताया और ना ही क्या और किसके यहाँ आया ये बताया। जो लड़का छोटी सी धमकी से डरने वाला आज पूरी अंग्रेज फौज उसका मुंह नहीं खुलवा सकी। सुबह जब अंग्रेज अफसर वापस आया तो उसने कान्हु के बारे पूछा की उसने कुछ बताया क्या। मगर कान्हु ने अपना मुंह नहीं खोला। गुस्से में आकर अंग्रेज ने लोहे की छड़ से ताबड़तोड़ मरने लगे। कान्हु बेहोश हो गया। किसी तरह मुंह खुलवाने
के कारण अंग्रेज उसको मरने भी नहीं देना चाहते थे। इसलिए सरकारी मोटर मंगवा कर कान्हु को हस्पताल ले जाने लगे। डॉ ने उसको दूसरे शहर ले जाने को कहा और बोले की छोटी उम्र हैं इसलिए इतनी मार सहन नहीं पाया। जल्दी से दूसरे शहर की तरफ मोटर को दौड़नी पड़ी। रस्ते में कब कान्हु इस दुनिया को छोड़ गया पता ही नहीं चला। अंग्रेजो ने उसके लाश को किसको सौंपते क्योकि कान्हु ने अपने गॉव का भी बताया अपने चाचाजी और गॉव वालों को बचाने के लिए। साल बीतने के बाद भी गॉव के लोग और खास कर रूपमल आज भी कान्हु के लौटने की राह देख रहे हैं। मगर उन्हें कौन बताये की लावारिश समझ कर अंग्रेजो ने उसको दफना दिया।
इस प्रकार एक नादान देशप्रेमी ने बिना कुछ किये देश प्रेम का धर्म निभाया।
जय हिन्द
ये बात कान्हु को अच्छी नहीं लगी। पहले जितना डरा हुआ था उससे ज्यादा गुस्सा आ रहा था क्योकि उसको अपने चाचाजी से बहुत लगाव था। उसने दोनों बहनो को इशारा किया की इस सैनिक को पकड़कर पेड बांध देते हैं और गॉव वालों को बचाते। हैं। लड़कियों ने कहा की पहले सैनिक को तो पकड़ो फिर आगे बात करते हैं । तीनो ने मिलकर उस सैनिक को पेड़ से बांध दिया। मगर लड़कियां वापस जाने नहीं बल्कि सारे हथियार गंतव्य स्थान तक पहुंचने के लिए अड़ गयी। मगर कान्हु सिर्फ उन गॉव वालो और अपने चाचाजी को बचाने के लिए जिद करने लगा। उसने लड़कियों को समझांने लगा। उसकी सोच ये थी की यदि इन अंग्रेजी सेना मार दे या भगा दे तो शायद ये हथियार भी काम आएंगे और बाद में इन्हे गंतव्य स्थान भी पहुंचा देंगे।ये भी तो देश भक्ति हैं। दोनों लड़कियों ये बात समझ में आ गयी। उन्होंने बैलगाड़ी को जब वापस मोड़ा तो सैनिक कुछ बोलने लगा। लड़कियों ने रुक कर उसको सुनने लगी. मुंह से कपडा हटाते ही वो सैनिक बोला की तुम तीनो २०-२५ सैनिकों को नहीं रोक सकोगी। उनके पास बन्दुके हैं। आप लोग जहां जाना चाहते हो वही जाओ। ये बच्चा नादान हैं। कान्हु ने कहा ... भले ही मैं छोटा हूँ मगर अपने चाचाजी से इन अंग्रेजो लड़ना सीखा हैं। वैसे आप जैसे देश द्रोही को तो यही मार देना चाहिए। सैनिक बोला। . मैं देश द्रोही नहीं हूँ। हम सभी को जोर जबरदस्ती से सैनिक बनाया हैं। मैं अपने बच्चे की कसम खाता हूँ ,मैं देशद्रोही नहीं हूँ। आप लोग कहे तो मैं भी अब तुम लोगो का साथ देने को तैयार हु क्योकि इस छोटे से बच्चे का जोश और तुम दोनों लड़कियों का हौशला देख मेरे अंदर देशप्रेम जाग उठा हैं। उस सैनिक का साथ मिलते ही तीनो में जोश आ गया। हथगोले और बन्दुक निकाल कर छोटे रास्ते से अंग्रेजी सेना से पहले गॉव के नज़दीक पहुंच गयी। वो छोटा रास्ता उस सैनिक ने ही बताया था। जैसे ही अंग्रेजी सेना दिखी कान्हु से ताबड़तोड़ बन्दुक चलायी और हथगोले को सीधे अंग्रेज के ऊपर फेंका जिससे अंग्रेज के साथ कुछ सैनिक मारे गए। कुछ सैनिक भागने लगे तो कान्हु का साथ देने वाले सैनिक ने आगे आकर घेर लिया। सभी ने हथियार डाल दिए। कान्हु ने सबको माफ़ करने की एक शर्त रखी की सभी अब स्वतंत्रता सेना में काम करेंगे और देश को आज़ाद करवाने की कशम लेंगे। सभी ने कसम ली की जब अंग्रेजो की सेना में रह कर मरना हैं तो क्यों ना देश के लिए मरे। कान्हु ने सबको उन लड़कियों का साथ देने को कहा और कहा की तुम सभी अब इन लड़कियों को गंतव्य स्थान पहुँचाओगे। जोर के धमाके कारण रूपमल भी दौड़ कर उस स्थान पर पहुंचे जब उन्होंने अंग्रेज को मरा हुआ देखा और कान्हु को सिपाहियों के बिच गिरा हुआ देख गबरा गए। जय भारतमाता की बोलते हुए तेजी से उन सब की और दौड़ने लगे। मगर कान्हु और उन सैनिकों ने जब भरत्नाता की जय जयकार लगायी तो रूपमल का गुस्सा शांत हुआ और वो रुक गए। क्योकि उन्होंने कान्हु की जान खतरे में देख कर ये कदम उठाया मगर यहाँ तो सभी भारतमाता की जय बोल रहे हैं। जब वो कान्हु के पास आये तब उन लड़कियों ने पूरा वृतान्त सुनाया। रूपमल ने अपने भतीजे कान्हु को गले लगाकर बोले आज मेरी तपस्या सफल हुयी हैं। अब तू ही अकेले इन सभी हथियारों को लेकर लड़कियों के साथ जाएगा। अब तो नहीं डरेगा। या किसी को साथ भेजु। सभी खिल खिला कर हंसने लगे। सबसे विदा लेकर वो तीनो निकल पड़े। अब रूपमल को डर नहीं हैंकिसी भी प्रकार का। सफर जरूर १०० किलोमीटर से ज्यादा का हैं मगर कान्हु पर पूरा भरोसा था। दिन आधा हो चूका था इसलिए कान्हु बैलगाड़ी को तेज़ी से हांकने लगा। शाम होते होते वो एक मंदिर के पास पहुंचे। रात को वही रुकने का फैशला लिया दोनों लड़कियां मंदिर के अंदर सो गयी और कान्हु दरवाजे के पास सो गया। सुबह देर से आँख खुली तब तक दोनों लड़कियों नहाधो कर तैयार हो चुकी थी। कान्हु को उन्होंने जगाया नहीं क्योकि वो उसको थका हुआ समझ कर सोने दे रही थी। अब कान्हु भी तैयार होकर वापस बैलगाड़ी को तैयार करने लगा। दोनों बहनों को आकर बैठने को बोलकर जल्दी जल्दी चलने को कहा। एक बोली ... क्यों कान्हु जल्दी जल्दी क्यों .. डर लग रहा हैं या भूख।
कान्हु .. दीदी डर अब इतना तो नहीं लगता मगर थोड़ी देर में भूख जरूर लग जाएगी क्योकि सुबह सुबह खाने का मज़ा कुछ और हैं। तीनो थोड़ी दूर जाने के बाद एक दूकान से दही और गुड के साथ प्याज़ ले आये। रोटियां उनके पास पहले से थी। तीनो ने भरपेट भोजन करने के बाद तेज़ी से शहर बैलगाड़ी को दौड़ने लगे। जहां हथियार पहुंचाने थे वहां से थोड़ी दूर पहले अंग्रेजो ने गस्त लगा रखी थी उनके पास पहुंचना बहुत ही मुश्किल का काम था। एक दीदी को कान्हु ने खाली हाथ जाने को कहा और बोला की वहां जो भी आपके गुरूजी हैं उन्हें केवल इशारा कर देना की माल आ गया हैं , फिर मैं दूसरी दीदी को भेजूंगा जो की पूरा रास्ता साफ़ होने का मुझे संकेत करेगी और मैं इस बैलगाड़ी को वहां तक भगा कर ले आऊंगा। तब तक गुरूजी भी कोई न कोई इंतज़ाम कर ही देंगे। जब पहली दीदी उस पाठशाला के पास पहुंची तो देखा की वहां कोई नहीं था। इधर उधर भी ध्यान दिया मगर कही कोई नज़र नहीं आये। आते भी कैसे ये लोग एक दिन देरी से चल रहे थे और सेनानियों ने अपना ठिकाना बदल दिया । एक दिन तो वही अंग्रेजो से भिड़ंत में निकल गया। इतने में एक बूढ़ी औरत ने उस लड़की से टक्करा गयी। लड़की ने जब उस बूढ़ी औरत को उठाया तो उसने एक कागज़ का टुकड़ा हाथ में थमा दिया। उस लड़की ने वही खोल कर पढ़ने लगी ये सब अंग्रेज देख रहे थे इसलिए वो बोले कुछ नहीं बस उस लड़की की हरकत पर नज़र रखे हुए थे। ये सारा नज़ारा कान्हु ने भी देख लिया की कुछ लोग दीदी पर नगर रखे हुए हैं इसलिए उसने वहां से निकल कर छुपने लगा। वो लड़की को जब नया ठिकाने का पता मिला। उसने वो कागज़ मुंह में खा लिया। तीनो अब अलग अलग दिशाओं में एक दूसरे को बचाने के लिए गुम रहे थे। क्योकि किसी भी तरह बैलगाड़ी में रखे हथियारों को अंग्रेजो के हाथ नहीं लगने देना हैं। दोनों लड़कियां धीरे धीरे नए पते की तरफ जाने लगी और कान्हु को इशारा किया की थोड़ा रुक रुक कर हमारे पीछे बैलगाड़ी को लेकर आना। अंग्रेजी सेना का ध्यान कान्हु की तरफ नहीं था। वो आराम से बैलगाड़ी को धीरे धीरे चलने लगा। जब भी लड़कियां किसी कारण से रूकती तो कान्हु भी बैलगाड़ी से उतर कर बार बार बैलो को सहलाने जैसा करता जिससे ये लगता की बैल आगे चलने को तैयार नहीं हैं। काफी लोग इधर उधर घूम रहे थे। इतना बड़ा शहर देख कान्हु वैसे ही मस्त हो रहा था। बड़ी बड़ी हवेलियां को देख वो दंग रह गया। जब वो एक बड़ी हवेली के पास पंहुचा तो दोनों लड़कियां कही आस पास दिखाई नहीं दी। वो इधर उधर ढूंढने लगा। ये देख कर एक सिपाही उसको इसका कारण पूछने लगा। वो फिर वही रोने जैसा मुंह बना कर कहने लगा की मैं अपने पिताजी के साथ आया मगर वो काफी देर से वापस नहीं आये हैं इसलिए बार बार यहाँ वहा देख रहा हूँ। आपने मेरे पिताजी को कही देखा हैं। सिपाही ने कहा .. मैं तेरे पिताजी को नहीं जनता तो देखूंगा कैसे , कौन हैं तेरे पिताजी । कोई बड़े व्यापारी हैं।
कान्हु बोला अभी थोड़ी देर पहले बैलगाड़ी के आगे आगे चल रहे थे की अचानक कही खो गए मुझे भूख भी लगी हैं । सिपाही ने उसे वही रुकने को कहा और बोले तुम यही रुको में तुम्हारे खाने का इंतज़ाम करता हूँ। सिपाही जब खाना लेने गया तब वापस दोनों दीदी दिखाई दी। उन्होंने उसे बैलगाड़ी को पास के मकान के अंदर ले जाने को बोला। कान्हु जल्दी से उस बैलगाड़ी को पास के मकान में ले गया और वपास वही आकर खड़ा हो गया। सिपाही जब खाना लेकर आया तो उसने बैलगाड़ी नहीं देखि। कान्हु खाना लेकर ऐसे खाने लगा जैसे कभी कुछ खाया नहीं हो और बरसों से कुछ नहीं खाया हैं। उसे भूख नहीं थी मगर जबरदस्ती वो खा रहा था। सिपाही उसे बैलगाड़ी के बारे में पूछने लगा तो कान्हु के मुंह में इतना सारा खाना होने के कारण बोला नहीं जा रहा था। उसने रुकने का इशारा किया। मगर सिपाही उसकी बैलगाड़ी को ढूंढने के लिए नज़रे यहाँ वहा दौड़ा रहा था। उसकी बैलगाड़ी कही नज़र नहीं आई। दोनों लड़कियां बैलगाड़ी को जल्दी से अंदर ले जाकर खाली कर रही थी बाहर जब कान्हु को सिपाही के साथ देखा तो गुरूजी ने उन लड़कियों को बैलगाड़ी खाली करके वहा से भागने को बोला। दोनों चुप चाप वहा से खिसक गयी। कान्हु को सिपाही छोड़ने को तैयार नहीं। सिपाही को लगा की कुछ न कुछ गड़बड़ हैं। उसने सिटी बजाकर दूसरे सिपाहीयों को भी बुला आकर सारा माज़रा समझा दिया। सभी उस बैलगाड़ी को यहाँ वहाँ ढूंढने निकल पड़े। गुरूजी के आदमियों ने बैलगाड़ी को बैलो से अलग करके तोड़ने का आदेश दे दिया। कान्हु को खूब डराया धमकाया की तेरी बैलगाड़ी कहा हे जिसमे सामान भरा हुआ था। कान्हु ने कहा की वो कोई बैलगाड़ी नहीं लेकर आया। दोनों लड़कियां अपने अपने घर में जाकर छुप गयी। कान्हु को सिपाही थाने में ले आये। बड़े साहब ने जब कान्हु को पूछा की कोनसे गॉव से हो और यहाँ क्या करने आये किसके घर आये को। कान्हु यहाँ किसी को नहीं जानता था। क्या बताता। रोने लगा। सिपाही ने कहा की साहब इसकी नादानियों पर मत जाओ। ऐसे लड़के बहुत चालाक होते हैं। आप इसको मार पीटकर बुलवाए। ये इन भारतियों की मदद कर रहा हैं। क्योकि हमे जो जानकारी मिली थी की किसी बैलगाड़ी में हथियार आ रहे हैं मुझे लगता हैं वो यही लेकर आया हैं। आप उसका ठिकाना पूछो साहब जी वर्ना ये लोग हमारी हुकूमत पर हमला बोल देंगे। इतने में एक अंग्रेज सिपाही जो की शहर की सीमा पर चौकसी के दौरान कान्हु को देखा था आ गया। उसने कान्हु को पहचान लिया। उसने कान्हु को बहलाने की कोशिश की की यदि तुम्हे नहीं पता की बैलगाड़ी में क्या था तो तुम केवल ये बता दो की वो बैलगाड़ी कहाँ पर गयी। हम तुम्हे मालामाल कर छोड़ देंगे। काफी देर तक डरा धमका कर जब कान्हु ने नहीं बताया तो अंग्रेज ने उसे गरम लोहे की छड़ से पीठ जलाने की बात कही। मगर कान्हु बिलकुल भी नहीं घबराया। वो सिर्फ यही बोला की जिसको जहां पहुंचना था वो वहा पहुंच गया। आप लोग चाहे मुझे मार डाले मगर मैं नहीं बताऊंगा। पूरी रात कान्हु को मारते रहे , गरम लोहे ही छड़ से जहां जलाया वहां मिर्च भी लगाई मगर कान्हु ने ना तो अपने गॉव का पता बताया और ना ही क्या और किसके यहाँ आया ये बताया। जो लड़का छोटी सी धमकी से डरने वाला आज पूरी अंग्रेज फौज उसका मुंह नहीं खुलवा सकी। सुबह जब अंग्रेज अफसर वापस आया तो उसने कान्हु के बारे पूछा की उसने कुछ बताया क्या। मगर कान्हु ने अपना मुंह नहीं खोला। गुस्से में आकर अंग्रेज ने लोहे की छड़ से ताबड़तोड़ मरने लगे। कान्हु बेहोश हो गया। किसी तरह मुंह खुलवाने
के कारण अंग्रेज उसको मरने भी नहीं देना चाहते थे। इसलिए सरकारी मोटर मंगवा कर कान्हु को हस्पताल ले जाने लगे। डॉ ने उसको दूसरे शहर ले जाने को कहा और बोले की छोटी उम्र हैं इसलिए इतनी मार सहन नहीं पाया। जल्दी से दूसरे शहर की तरफ मोटर को दौड़नी पड़ी। रस्ते में कब कान्हु इस दुनिया को छोड़ गया पता ही नहीं चला। अंग्रेजो ने उसके लाश को किसको सौंपते क्योकि कान्हु ने अपने गॉव का भी बताया अपने चाचाजी और गॉव वालों को बचाने के लिए। साल बीतने के बाद भी गॉव के लोग और खास कर रूपमल आज भी कान्हु के लौटने की राह देख रहे हैं। मगर उन्हें कौन बताये की लावारिश समझ कर अंग्रेजो ने उसको दफना दिया।
इस प्रकार एक नादान देशप्रेमी ने बिना कुछ किये देश प्रेम का धर्म निभाया।
जय हिन्द
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