आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
आज फिर निकला हु कुछ पाने को
आज उम्मीद से ज्यादा पाने को
घर से निकला हु कुछ पाने को
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
वही रोज़ की तरह अल सुबह उठाना
वही रोज़ की तरह दो जून की रोटी पाना
वही रोज़ की तरह हाथों की लकीरो को देखना
वही रोज़ की तरह धुप में दौड़ना
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
कहा हैं दीवाली का धमाका
कहा हैं होली की रंगीनियाँ
कहा हैं रमज़ान का रोज़ा
कहा हैं चर्च की मोमबत्तियां
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
ढूंढ रहा हु आज भी उस जमीन को
ढूंढ रहा हूँ आज भी उस लकीर को
ढूंढ रहा हूँ आज भी उस फ़क़ीर को
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
जिसमे मेरा वज़ूद छुपा हुआ हैं
जिसमे मेरा तक़दीर छुपा हुआ हैं
जिसमे मेरा भविष्य छुपा हुआ हैं
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
देख कर ऊपर आश्मान की तरफ
आज भी उससे पूछता हूँ
कौन हु मैं
जो सुबह से रात तक
रात से सुबह तक
तुजे याद करता हूँ
मगर आज भी अपने कर्म से
पीछे नहीं जाता हूँ
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
मिल जाती हैं दो जून की रोटी
लौट के घर की तरफ आता हूँ
पंछियों की तरह दाना तिनका
ढूंढने निकलता हूँ
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
न धुप देखता हूँ
न छाव देखता हूँ
न बरसात देखता हूँ
न सर्दी की मार देखता हूँ
देखता हूँ तो सिर्फ अपनों की भूख देखता हूँ
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
आज फिर निकला हु कुछ पाने को
आज उम्मीद से ज्यादा पाने को
घर से निकला हु कुछ पाने को
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
वही रोज़ की तरह अल सुबह उठाना
वही रोज़ की तरह दो जून की रोटी पाना
वही रोज़ की तरह हाथों की लकीरो को देखना
वही रोज़ की तरह धुप में दौड़ना
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
कहा हैं दीवाली का धमाका
कहा हैं होली की रंगीनियाँ
कहा हैं रमज़ान का रोज़ा
कहा हैं चर्च की मोमबत्तियां
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
ढूंढ रहा हु आज भी उस जमीन को
ढूंढ रहा हूँ आज भी उस लकीर को
ढूंढ रहा हूँ आज भी उस फ़क़ीर को
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
जिसमे मेरा वज़ूद छुपा हुआ हैं
जिसमे मेरा तक़दीर छुपा हुआ हैं
जिसमे मेरा भविष्य छुपा हुआ हैं
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
देख कर ऊपर आश्मान की तरफ
आज भी उससे पूछता हूँ
कौन हु मैं
जो सुबह से रात तक
रात से सुबह तक
तुजे याद करता हूँ
मगर आज भी अपने कर्म से
पीछे नहीं जाता हूँ
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
मिल जाती हैं दो जून की रोटी
लौट के घर की तरफ आता हूँ
पंछियों की तरह दाना तिनका
ढूंढने निकलता हूँ
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
न धुप देखता हूँ
न छाव देखता हूँ
न बरसात देखता हूँ
न सर्दी की मार देखता हूँ
देखता हूँ तो सिर्फ अपनों की भूख देखता हूँ
आज फिर निकला हूँ फिर घर से कुछ लाने को
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